रविवार, 13 अगस्त 2017

सावधान! कन्‍हैया निशाने पर हैं...


जन्‍माष्‍टमी को दो दिन बचे हैं और मथुरा के मंदिरों-घाटों-आश्रमों-गेस्‍ट हाउसों में भारी  भीड़ है। इस भीड़ में अधिकांशत: पूर्वी प्रदेश के दर्शनार्थी ही हैं, इसके बाद क्रमश: अगले  नंबरों पर पंजाब, दिल्‍ली, हरियाणा और राजस्थान व पश्‍चिम बंगाल के लोग आते हैं। हर  बार की तरह इस बार भी शहर के वाशिदों को आशंका है कि जन्‍माष्‍टमी के ठीक बाद इन  दर्शनार्थियों द्वारा छोड़े गए अपने खाने-पीने-रहने-निवृत होने के अवशेषों से महामारी फैल  जाएगी। ब्रज पिछले कई वर्षों से इस आशंका को वास्‍तविक रूप में भुगत भी रहा है।

सरकारी अमला और धार्मिक व समाजसेवी संस्‍थाऐं सब मिलकर दर्शनार्थियों की हर संभव  सेवा और सुरक्षा करता है मगर सड़कों के किनारे बसें रोककर झुंड के झुंड जब निवृत होते  हैं और स्‍नान कार्य संपन्‍न करते हैं तो शहर वासी चाहकर भी उनके प्रति सेवाभाव नहीं  रख पाता और अपने ही अतिथियों के प्रति एक आशंका से भर उठता है।

पिछले लगभग 20 साल के आंकड़े बताते हैं कि गुरूपूर्णिमा और जन्‍माष्‍टमी के ठीक बाद  से पुरे ब्रज क्षेत्र में वायरल, चिकनगुनिया जैसे रोग महामारी की तरह फैलते हैं। पिछले दो  दिन से जापानी इंसेफेलाइटिस के कारण गोरखपुर मेडीकल कॉलेज में जब से बच्‍चों की  मौत का मंज़र देखा है, तब से ब्रज क्षेत्र में ऐसी ही किसी बीमारी की आहट से लोग  चिंतित हैं।

बाबा जयगुरुदेव के अधिकांश अनुयायी पुर्वी उत्‍तरप्रदेश से ताल्‍लुक रखते हैं और शहरी  क्षेत्र में आने वाले हाईवे का आधे से अधिक हिस्‍से पर इनका कब्‍ज़ा रहता है। अतिथियों  की सेवा धर्म होती है मगर अतिथि इस सेवा का जो ''प्रसाद'' ब्रजवासियों को सौंप कर  जाते हैं, वह इस बार भयभीत कर रहा है क्‍योंकि गोरखपुर में हुई मौतों का ताजा उदाहरण  सामने है।  

अधिकांशत: बच्‍चों को ही डसने वाली जापानी इंसेफेलाइटिस नामक इस महामारी से अकेले  पूर्वी उत्‍तरप्रदेश में ही 1978 से अब तक मरने वाले बच्‍चों की संख्‍या लगभग ''एक  लाख'' होने जा रही है। इसमें वो बच्‍चे शामिल नहीं हैं जो नेपाल के तराई इलाकों और  बिहार के सीमावर्ती  क्षेत्रों से गोरखपुर मेडीकल कॉलेज में दाखिल किए गए।

अब तक ''गोरखपुर ट्रैजडी'' को ना जाने कितने कोणों से देखा जांचा जा रहा है, एक ओर  सरकार पर विपक्ष हमलावर हो रहा है तो दूसरी ओर मीडिया ट्रायल करने में कोई कसर  नहीं छोड़ी जा रही है। कहीं कुछ कथित समाजसेवी अपनी पूर्व में व्‍यक्‍त की गई  आशंकाओं को ''सच'' साबित करने पर तुले हैं।

नि:संदेह प्रदेश की योगी सरकार से मेडीकल कॉलेज प्रशासन पर निगरानी रखने में भारी  चूक हुई और इतने बच्‍चों की मौत का कलंक उसे ढोना ही होगा क्‍योंकि लापरवाही के  उत्‍तरदायित्‍व में वह तथा स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय सहभागी रहा परंतु दूसरों पर दोष लादने की  राजनैतिक पृवृत्‍ति को छोड़ अब मरीजों को, मृत बच्‍चों के परिजनों को हालिया राहत देते  हुए खुले में शौच से संपूर्ण प्रदेश (खासकर पूर्वी उत्‍तर प्रदेश) को मुक्‍त करने के अभियान  को कागजों से नीचे उतारने का काम कमर कस कर किया जाना चाहिए।
प्रशासनिक अधिकारियों पर ही नहीं, ग्रामीण स्‍तर पर इसके लिए ''जागरूकता अभियान  इकाईयां'' बनाकर स्‍वयं सरकार के ''राजनैतिक समाजसेवी'' इस अभियान में जुटेंगे तो  स्‍थिति काबू में लाई जा सकती हैं। ये इतना असाध्‍य भी नहीं है।

डिजिटलाइजेशन के इस युग में इस तरह की मौतों के लिए हम जैसे पढ़े-लिखे लोग भी  कम जिम्‍मेदार नहीं हैं यानि वो वर्ग जो अपने सुख तक सिमटा है और दोषारोपण करती  बहसों का आनंद ले रहा है, बजाय इसके कि स्‍वच्‍छता और अशौच के प्रति लोगों को  जागरूक करे।

बहरहाल, मैं वापस मथुरा और ब्रज के अन्‍य धार्मिक स्‍थानों पर फैले उस भय से सभी को  परिचित कराना चाहती हूं जो कि अतिथियों का स्‍वागत करने से पहले उसके आफ्टर  इफेक्‍ट्स से डर रहा है। हमारे कन्‍हाई भी अबकी बार इंसेफेलाइटिस के निशाने पर  हैं...नंदोत्‍सव और राधाष्‍टमी तक वे खतरे में रहेंगे...हमें तैयार रहना ही होगा।

जन्‍माष्‍टमी पर हमारे यहां तो कन्‍हाई जन्‍मेंगे ही, लेकिन हम सभी ब्रजवासी गोरखपुर के  उन कन्‍हाइयों की अकाल मौत से भी बेहद दुखी हैं जो सरकारी खामियों, अपनों के अशौच  और उनकी लापरवाहियों का शिकार बन रहे हैं।

सरकार पर दोषारोपण इलाज मुहैया न कराने के लिए किया जा सकता मगर सफाई की  सोच जब तक हमारे भीतर नहीं बैठेगी, तब तक हम अपने बच्‍चों को यूं ही गंवाते रहेंगे।  हमें गरीब के नाम पर रहम परोसने की राजनीति छोड़नी होगी क्‍योंकि कोई कितना भी  गरीब क्‍यों ना हो, गंदे हाथ धोने को मिट्टी और राख तो सभी जगह मिल सकती है, नीम-  तुलसी हर घर में हो सकता है इसलिए बहानेबाजी, दोषारोपण तथा मौतों के आंकड़े गिनने  से बेहतर है कि सच्‍चाई को स्‍वीकार किया जाए और अपने स्‍वच्‍छता की जिम्‍मेदारी खुद  उठाई जाए।

हम तैयार हैं अपने अतिथियों की तमाम निवृत पश्‍चात फैली गंदगियों को साफ करने के  लिए और अपने कन्‍हाई पर आ रहे महामारियों के खतरे से जूझने के लिए मगर  अतिथियों से भी आशा करते हैं कि वे ब्रज रज के सम्‍मान को तार-तार न करें।
अपनी श्रद्धा के नाम पर ब्रजवासियों को सौगात में ऐसा कुछ परोसकर न जाएं जो उन पर  और उनके परिवार पर भारी पड़े।  

-अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

अंसारी साहब…शहर के कुछ बुत ख़फ़ा हैं इसलिये, चाहते हैं हम उन्हें सज़दा करें

बुद्धिमत्‍ता जब अपने ही व्‍यूह में फंस जाए और पाखंड से ओवरलैप कर दी जाए तो वही स्‍थिति हो जाती है जो आज निवर्तमान उपराष्‍ट्रपति मोहम्‍मद हामिद अंसारी की हो रही है।

''देश के मुस्लिम समुदाय में घबराहट व असुरक्षा का माहौल है'' कहकर आज से निवर्तमान उपराष्‍ट्रपति का टैग लगाकर चलने वाले हामिद अंसारी ने अपने पूरे 10 साल के राज्‍यसभा संचालन पर पानी फेर लिया। 24 घंटों में ऐसा क्‍या हुआ जो हामिद अंसारी को असुरक्षित कर गया, रिटायरमेंट फोबिया की गिरफ्त में आ चुके 80 साल की उम्र पार कर चुके अंसारी ने देश के उस माहौल पर उंगली उठाई है जो इक्‍का-दुक्‍का दुर्भाग्‍यपूर्ण घटनाओं से प्रेरित है। ज़ाहिर है वे अपनी सियासती वफादारी साबित करने पर आमादा दिखाई दे रहे हैं।

बतौर काबिलियत 01 अप्रैल 1934 को जन्‍मे मोहम्मद हामिद अंसारी ने अपने करियर की शुरुआत भारतीय विदेश सेवा से एक नौकरशाह के रूप में 1961 के दौरान तब की थी जब उन्हें संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का स्थायी प्रतिनिधि नियुक्त किया गया। वे आस्ट्रेलिया में भारत के उच्चायुक्त भी रहे। बाद में उन्होंने अफगानिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात, तथा ईरान में भारत के राजदूत के तौर पर काम किया, वो भारतीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष भी रहे। 1984 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। वे मई सन 2000 से मार्च 2004 तक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उपकुलपति रहे। 10 अगस्त 2007 को भारत के 13वें उपराष्ट्रपति चुने गये थे। 2002 के गुजरात दंगा पीड़ितों को मुआवजा दिलाने और सदभावना के लिए उनकी भूमिका के लिए भी उन्‍हें सराहा जाता है।


हामिद अंसारी ने बतौर उपराष्‍ट्रपति राष्ट्रीय ध्वज़ को सेल्यूट नहीं किया
कल जब उनका विदाई समारोह हो रहा था, तब प्रधानमंत्री मोदी आदतन उनसे चुटकियां ले रहे थे, ऐसे में मुझे एक सीन याद आ रहा था, अमेरिकी राष्‍ट्रपति ओबामा के आगमन पर इन्‍हीं हामिद अंसारी ने बतौर उपराष्‍ट्रपति राष्ट्रीय ध्वज़ को सेल्यूट नहीं किया। एक नहीं, ऐसे अनेक वाकये हैं जिनका कम से कम अब उनके इस ''मुस्‍लिमों के लिए असुरक्षा वाले'' बयान के बाद जवाब लिया जाना चाहिए।

10 साल तक देश का उपराष्ट्रपति रहते हुए क्‍या अंसारी साहब ये बतायेंगे कि भारत अगर मुस्‍लिमों के लिए असुरक्षित है तो-


कांग्रेस सरकार ने पूरी दुनिया से दुत्कारे हुए 50000 रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में क्यों बसाया,
कश्‍मीर राज्‍य से सभी पंडितों को किसने भगाया,
हमारे राष्‍ट्रपति कलाम साहब क्‍या मुस्‍लिम नहीं थे, क्‍या वो असुरक्षित थे इसीलिए इतने बड़े वैज्ञानिक बन गए,
भारत मुस्‍लिमों के लिए असुरक्षित है तभी तो 6 करोड़ बंग्लादेशी पिछ्ले 45 साल से यहाँ देश के संसाधनों को लूट रहे हैं, पश्चिम बंगाल, असम की जनसांख्‍यिकी तो ध्‍वस्‍त ही इन्‍होंने की,
भारत असुरक्षित है इसलिए छोटा ओवैसी यह कह पाता है की देश से 15 मिनट पुलिस हटा दो हम सब हिन्दुओं का सफाया कर देंगे,
भारत मुस्‍लिमों के लिए असुरक्षित है तभी तो जेएनयू में भारत के टुकड़े करने वाले पूरे देश के टैक्‍स पर पल रहे हैं,
भारत असुरक्षित है इसलिए लव जिहाद और धर्म परिवर्तन यहाँ सामान्य घटनाएं हैं,
भारत मुस्‍लिमों के लिए असुरक्षित है इसीलिए पाकिस्तान के झंडे और पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे कहीं भी लगाये जा सकते हैं,
मुस्‍लिमों के लिए असुरक्षा का माहौल है तभी तो दिल्‍ली के जाफराबाद, सीलमपुर और अन्य मुस्लिम इलाकों में किसी हिन्दू की जमीन खरीदने की हिम्मत नहीं होती, इन इलाकों में अघोषित धारा 370/35 लगी हुई है,

भारत मुस्‍लिमों के लिए असुरक्षित है इसीलिए 26 अगस्‍त 2015 को जारी जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 10 सालों में मुस्लिमों की जनसंख्या में भारी इजाफा दर्ज किया गया, यानि उनकी आबादी में 24.6 फीसदी की बढ़ोत्तरी।
अजीब आंकलन है अंसारी साहब का- असुरक्षा में तो लोगों की चिंताएं बढ़ती हैं तो क्‍या चिंतित व्‍यक्‍ति बच्‍चे पैदा करने में जुट जाते हैं,

तो अंसारी साहब...

दुनिया में "मुसलमानों" को कोई भी देश अपने यहाँ नहीं आने देना चाह्ता ...
यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका में रहने वाले पाकिस्तानी, बांग्लादेश अफगानिस्तान के मुस्लिम्स खुद को वहां इंडियन बताते हैं क्यूंकि बाकी मुस्लिम्स को तो वहां आंतकवादी माना जाता है।

ये भारत है जहाँ ग्रेजुएट होने वाली मुस्‍लिम बेटियों को केंद्र सरकार 51000 रुपये बतौर शगुन देने की घोषणा करती है ताकि बच्‍चियां पढ़ सकें और देश-दुनिया का मुकाबला अपने बूते कर सकें। उन्‍हें किसी हामिद अंसारी की सलाह की जरूरत ही ना पड़े।

आप जैसे लोगों ने मुसलमानों को सभी के साथ मुसलमान की बजाय ''मुसलमान बनाम अन्‍य'' बना दिया है। तभी तो विश्‍वभर के गैर इस्लामिक लोगों में मुस्लिम के प्रति नफरत बढ़ी है लेकिन हम खुश हैं क्‍योंकि हमारे देश में अधिकांश गैर मुस्लिम अब्दुल कलाम जी को ही अपना आदर्श भी मानते हैं ।

और 24 घंटे के अंदर दो बार दिए गए इस एक बयान के बाद निश्‍चित ही आप आदर्श बनने से चूक गए हैं।
गनीमत रही कि आपकी डिप्‍लोमैटिक-सियासती सोच से आपकी पत्‍नी सलमा अंसारी अलग सोचती हैं। जब ट्रिपल तलाक पर बहस-मुबाहिसे चल रहे थे तब आपने खामोशी क्‍यों ओढ़े रखी, मगर सलमा जी ने देवबंदियों के खिलाफ जाकर कहा मुस्लिम महिलाओं को खुद क़ुरान पढ़ने और किसी के कहने पर गुमराह नहीं होने की सलाह दी थी।

मोहम्मद हामिद अंसारी ने जाते-जाते अपने व्‍यक्‍तित्व की जो आखिरी छाप देशवासियों पर छोड़ी है, वह उन्‍हें एक पाखंडी दर्शाती है। और कोई भी समाज या सरकार किसी पाखंडी को तब तक दण्डित नहीं कर सकती जब तक पाखंडी अनैतिकता का प्रदर्शन करते पकड़ा न जाए।

एक शिक्षाविद् होने के नाते अंसारी साहब ये बखूबी जानते होंगे कि पाखंडी अनैतिक आचरण वाले व्यक्ति के समान खुले तौर पर अपराध नहीं करता। वह योजनाबद्ध तरीके से इस प्रकार अपराध करता है कि उसका ऐसा आचरण आसानी से न पकड़ा जा सके। ऐसा व्यक्ति प्रायः ऐसे व्यक्तियों को अपना शिकार बनाता है जो उसके बाह्य आचरण के मोह जाल में फंसे होते हैं, ऐसे लोगों को पकड़ने के लिए जाल बिछाने की आवश्यकता होती है और यहां तो अंसारी साहब स्‍वयं को ''मुस्‍लिम हितरक्षक'' बताने के अपने पाखंड को खुद ही सरेआम कर चुके हैं।
बहरहाल, देश का मुसलमान तुष्‍टीकरण की राजनीति के दुष्‍चक्र से काफी कुछ बाहर आ चुका है, जो शेष है वह भी अपना भला-बुरा ''कांग्रेस-बीजेपी-सपा-जदयू-राजद-तृमूकां-माकपा'' आदि के अलावा भी सोच सकता है।

कल मुंबई में 1000 उलेमाओं द्वारा देश के मुसलमानों की सोच को यूएन तक भेजा गया, यह एक बानगी है हामिद अंसारी साहब, कि मुसलमान देश में असुरक्षित नहीं हैं बल्‍कि वह अपने ही ''कट्टरवाद'' से असुरक्षित हैंं, जिसे अगर आप जैसे शिक्षाविद् ''स्‍वस्‍थ-सोच'' के साथ दूर करने में  लगें तो दूर किया जा सकता है, बस 80 बरस बाद भी  सियासत करने से बाज आयें ।

अनवर जलालपुरी ने आज की इस परिस्‍थिति पर क्‍या खूब कहा है-

खुदगर्ज़ दुनिया में आखिर क्या करें
क्या इन्हीं लोगों से समझौता करें

शहर के कुछ बुत ख़फ़ा हैं इसलिये
चाहते हैं हम उन्हें सज़दा करें

चन्द बगुले खा रहे हैं मछलियाँ
झील के बेचारे मालिक क्या करें

तोहमतें आऐंगी नादिरशाह पर
आप दिल्ली रोज़ ही लूटा करें

तजरुबा एटम का हम ने कर लिया
अहलें दुनिया अब हमें देखा करें



-अलकनंदा सिंह

शनिवार, 5 अगस्त 2017

चोटी कटवा: खौफ़ की मौत तो जाहिल मरा करते हैं

सबसे पहले एक शेर-
बड़े खौफ़ में रहते हैं वो, जो ज़हीन होते हैं
मगर खौफ़ की मौत तो जाहिल मरा करते हैं...

और इन्हीं दो पंक्‍तियों के साथ आज सुबह तक चोटी काटने की घटनाओं की संख्‍या बढ़कर 62 पहुंच गई।

ग़ज़ब है इस देश की रंगत कि हर छ: महीने के अंतराल पर कोई न कोई ऐसी अफवाह मुहैया करा देती है जो लोगों के ''ज़ाहिल होने'' का फायदा बखूबी उठाती है।

गाहे ब गाहे फैलने वाली इन अफवाहों के चलन पर गौर करें तो एक बात इनमें कॉमन है कि इनके शिकार और शिकारी दोनों ही उस तबके से आते हैं जहां जागरूकता का नामोनिशान नहीं होता, ये दायरा गांव-खेड़े से लेकर शहर के उन लोगों तक फैला है जो किसी भी बात को जांच-परखने की बजाय जस का तस मान लेने के आदी होते हैं। इन्‍हीं का फायदा धर्म के छद्म गुरुओं से लेकर तांत्रिकों तक उठाया जाता है, एक कदम और आगे बढ़कर बाजार भी इन्‍हें कैश करने में पीछे नहीं रहता।

डर का बाजार से बहुत बड़ा रिश्‍ता है। लोगों में बीमारियों का डर फैलाकर दवा कंपनियां और चिकित्‍सक हों या गरीब होने का डर फैलाकर चिटफंड कंपनियां, करियर में पीछे रह जाने का डर फैलाकर टैक्‍निकल एजूकेशन संस्‍थान, पति-भाई-पिता की 'उम्र कम' हो जाने का डर फैलाकर कई त्‍यौहारों को अपने तरीके से सैलिब्रेट करन वाने वाली कंपनियां हों, सभी डर फैलाकर अपनी मार्केटिंग का स्कोप बढ़ा रहे हैं। तो फिर चोटी काटने की अफवाह को सच कैसे मान लिया जाए।

यह और कुछ नहीं मास हिस्टीरिया नाम की मानसिक समस्या है। इस समस्या के तहत एक स्‍थान विशेष में रहने वाला पूरा समूह किसी अफवाह पर भरोसा कर लेता है और उसे सच मानने लगता है। और तो और इन्‍हें सच मानकर लोग इस तरह की हरकतें करने भी लगते हैं। इसी तरह एक बार मुंहनोचवा की खबर फैली थी जिसे आजतक किसी ने नहीं देखा लेकिन अफवाह पर लोगों को इतना विश्वास हो गया कि सोते वक्त उन्हें लगने लगा कि कोई उन्हें नोचकर भाग रहा है।

मास हिस्‍टीरिया के ऐसे केस भारत में होते हों , ऐसा नहीं है बल्‍कि यह पूरे विश्‍व में फैले हुए हैं तभी तो ''इकॉनॉमिक वॉरफेयर: सीक्रेट ऑफ वेल्‍थ क्रिएशन इन द एज ऑफ वेलफेयर पॉलिटिक्‍स'' के लेखक जायद के. अब्‍देलनर कहते हैं कि
“Always remember... Rumors are carried
by haters, spread by fools, and
accepted by idiots.”


होम्‍योपैथी में तो बाकायदा किसी भी रोग का इलाज ही मानसिक लक्षणों के आधार पर किया जाता है और मास व इंडीविजुअल हिस्‍टीरिया के लक्षणों में पाया गया है कि रोगी को हमेशा अपने आसपास कोई छाया सी महसूस होती है, कभी कोई दूसरा (invisible) उन्‍हें शरीर के अमुक अंगों पर कोच रहा होता है, कभी रोगी को लगता है कि उसके शरीर में बहुत दर्द व जलन है जबकि पैथॉलॉजिकली लक्षण किसी बीमारी के नहीं मिलते। इन मानसिक अवस्‍थाओं के लक्षणों वाले रोगियों को होम्‍योपैथी में दवाओं से ठीक करने का निश्‍चित प्रावधान है।

अफवाहों के इस बाजार में मीडिया का भी अपना हिस्‍सा है, वह ज़रा सी बात को तूल देने का आदी है, रीडर्स और व्‍यूअर्स की संख्‍या का लालच सारे एथिक्‍स किनारे करवा देता है और जागरूकता फैलाने के लिए जिस माध्‍यम को प्रयुक्‍त किया जाना चाहिए, वह फ्रंट पेज पर चोटी कटने की घटनाओं को लीड बनाकर अपना जहालत और लालच दोनों दिखा देता है। चोटी कटी, अस्‍त-व्‍यस्‍त कपड़ों में बेहोश पड़ी महिलाओं के फोटो आज के हर समाचारपत्र का चेहरा होते हैं। जिन्‍हें जागरूकता फैलाने और अंधविश्‍वास को हटाने का माध्‍यम बनना चाहिए, वे भी अफवाहों से अपना कलेक्‍शन करने की सोच रहे हैं।

बहरहाल अफवाहें हमारी अपनी सोच का आइना होती हैं, हमारी सोच जितनी डरी हुई होगी उतनी ही ''किसी और की बात'' ''किसी और का सच'' '' किसी और का चरित्र'' अपने मनमुताबिक ढाल लेगी। ''किसी और'' के लिए किया गया आंकलन स्‍वयं की सोच पर आधारित होता है।

चोटी कटवा: पुलिस-प्रशासन की एडवाइजरी

पुलिस-प्रशासन चाहे कितनी भी एडवाइजरी जारी कर दे मगर चोटी कटने जैसी इस डरी हुई सोच का इलाज तो प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति को स्‍वयं करना होगा।
समाज में अंधविश्‍वास के प्रति लगातार जागरुकता अभियान चलाए जाने की आवश्‍यकता है। सामाजिक चेतना ही एकमात्र ऐसा माध्‍यम है जो अफवाहों की संक्रामकता को कम कर सकता है।




और अंत में एक अनाम कवि की कविता- इन अफवाहों के नाम

अफवाहें भी उड़ती/उड़ाई जाती हैं,
जैसे जुगनुओं ने मिलकर
जंगल में आग लगाई
तो कोई उठे कोहरे को
उठी आग का धुंआ बता रहा
तरुणा लिए शाखों पर उग रहे
आमों के बोरों के बीच
छुप कर बैठी कोयल
जैसे पुकार कर कह रही हो
बुझा लो उड़ती अफवाहों की आग
मेरी मिठास सी कुह-कुहू पर ना जाओ
ध्यान ना दो उड़ती अफवाहों पर
सच तो यह है कि अफवाहों से
उम्मीदों के दीये नहीं जला करते
बल्कि उम्मीदों पर पानी फिर जाता है
ख्वाब कभी अफवाह नहीं बनते
और यदि ऐसा होता तो अफवाहें
मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे,गिरजाघर से
अपनी जिंदगी की भीख
भला क्यों मांगती ?

- अलकनंदा सिंह
Blog: www.abchhodobhi.blogspot.in

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

एक फॉन्‍ट की ताकत: जिसने एक सत्‍ताधीश को कुर्सी से उतार फेंका


कभी कवि रामधारी सिंह "दिनकर" ने कलम का महत्‍व बताते हुए लिखा था-

दो में से क्या तुम्हें चाहिए कलम या कि तलवार 
मन में ऊँचे भाव कि तन में शक्ति विजय अपार

अंध कक्ष में बैठ रचोगे ऊँचे मीठे गान
या तलवार पकड़ जीतोगे बाहर का मैदान

कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली, 
दिल की नहीं दिमागों में भी आग लगाने वाली 

पैदा करती कलम विचारों के जलते अंगारे, 
और प्रज्वलित प्राण देश क्या कभी मरेगा मारे 

इस कविता को लिखते हुए तब के खालिस देसी समय में दिनकर जी को यह कहां पता था कि अब कलम की जगह वो  फॉन्‍ट ले लेंगे, जो एक तलवार तो क्‍या हजारों हजारों तलवारों को एक साथ काट देंगे। दिनकर जी को तो तब यह भी  कहां पता था कि इन फॉन्‍ट्स की दुनिया अधूरे और बेहाल से एक देश के प्रधानमंत्री को न सिर्फ नाकाबिल करार दे देगी  बल्‍कि उसे सपरिवार जेल की ओर धकेल देगी। जी हां, ये है आज की कलम यानि फॉन्‍ट की ताकत।

अब देखिए ना पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को इसी फॉन्‍ट की ताकत ने आज ज़मीं पर ला पटका, इस फॉन्‍ट  का नाम है ''कैलिबरी''। फॉन्‍ट की इस ताकत को देखकर आज 21वीं सदी के डिजिटल युग में कहा जा सकता है कि  अब तलवार से ज्यादा शक्तिशाली फॉन्ट है।

आज पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने करोड़ों रुपये के बहुचर्चित पनामागेट मामले में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की संपत्ति  की जांच के बाद संयुक्त जांच समिति (JIT) की रिपोर्ट के आधार पर शरीफ और वित्त मंत्री इशाक डार को  अयोग्य करार दे दिया, शरीफ को इसके बाद अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।

हुआ यूं कि पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित JIT को मरियम शरीफ ने जाली दस्तावेजों के जरिए गुमराह  करने की कोशिश की थी। मरियम ने पनामागेट से संबंधित जो दस्तावेज भेजे थे, वो कैलिबरी फॉन्ट में टाइप थे और  दस्‍तावेजों में तारीख 31 जनवरी 2007 के पहले की थी जबकि कैलिबरी फॉन्ट 31 जनवरी 2007 से पहले  व्यावसायिक प्रयोग के लिए उपलब्ध ही नहीं था। तब जेआईटी द्वारा संदेह जताए जाने के बाद सोशल मीडिया में  मरियम नवाज शरीफ की जमकर आलोचना भी हुई। कहा जाने लगा कि बेटी की एक गलती ने बाप को कहीं का नहीं  छोड़ा एक ट्विटर यूजर ने जेआईटी के बयान के स्क्रीन शॉट भी लगाए जिस पर विवाद उठ खड़ा हुआ था, और नतीज़ा  आज दुनिया के सामने है।


क्‍या है कैलिबरी फॉन्ट

कैलिबरी फॉन्ट के चर्चा में आने का रोचक इतिहास है। इसमें रियल इटैलिक्स, स्माल कैप्स और मल्टीपल न्यूमरल सेट  होता है। वार्म एंड सॉफ्ट कैलिबरी को 2004 में लुकास डी ग्रूट ने डिजाइन किया था। एमएस ऑफिस 2007 और विंडोज  विस्टा के लांच के मौके पर कैलिबरी आम लोगों को 31 जनवरी 2007 को उपलब्ध हुआ। एमएस वर्ड में टाइम्स न्यू  रोमन और माइक्रो सॉफ्ट पावर प्वाइंट, एक्सेल, आउट लुक और वर्डपैड में एरियल की जगह डिफॉल्ट के तौर पर कैलिबरी  ने जगह ली। स्क्रीन पर दमदार दिखने वाले कैलिबरी फॉन्ट का एमएस ऑफिस के सभी वर्जन 2016 तक इस्तेमाल  करते रहे।

कुल मिलाकर हुआ ये कि पनामा की लॉ फर्म मोसेक फोंसेका के खुफिया दस्तावेज लीक होने और आज सुबह तक  पनामागेट के आफ्टर इफेक्‍ट में कैलिबरी फॉन्‍ट ने अपना नाम ऐतिहासिक रूप से दर्ज करा लिया। जो कैलिबरी फॉन्‍ट  अभी तक सिर्फ डिजिटल वर्क के लिए प्रयोग किया जाता था, अब उसे एक देश के प्रधानमंत्री को अपदस्‍थ करने के लिए  याद किया जाएगा। इसीलिए आज दिन भर ट्विटर पर चलता रहा In #Pakistan, Calibri is  the font of democracy #NawazSharif.

कवि रामधारी सिंह दिनकर तो कलम की ताकत का महत्‍व तलवार से ज्‍यादा बता गए मगर आज डिजिटल युग में  कलम को फॉन्‍ट ने जिस तरह रिप्‍लेस किया है, वह कम से कम पाकिस्‍तान के लिए तो ऐतिहासिक बन ही गया।
पाकिस्‍तान ही क्‍यों, आज यह पूरे विश्‍व का सच है।

बदलते वक्‍त ने यूं भी आज कलम और हाथ का संबंध लगभग खत्‍म सा कर दिया है। लिखने वाले किसी भी पेशे में  अब कलम की जगह कंम्‍यूटर और उससे उभरे विभिन्‍न फॉन्‍ट का ही इस्‍तेमाल होता है। लिखने-लिखाने की आदत तो  अब सिर्फ उन लोगों तक सीमित रह गई है जिन्‍हें कंम्‍यूटर का प्रयोग करना नहीं आता अन्‍यथा हाथ से लिखना अब  समय की बर्बादी लगती है।

बहरहाल, नवाज शरीफ की बेटी को भी यह इल्‍म नहीं रहा होगा कि एक अदद फॉन्‍ट की किस्‍म उनके पूरे परिवार पर  कितनी भारी पड़ने वाली है। यदि उसे ये इल्‍म रहा होता तो वह किसी कब्र में पैर लटकाकर बैठे मुंशी से ही वो दस्‍तावेज  तैयार कराकर कोर्ट के सामने लाती। हो सकता है कि आज वो मुंशी कोर्ट में गवाही के लिए मौजूद ही नहीं होता, और  होता भी तो उसे खरीदा जा सकता था।

मुंशी की हैंडराइटिंग काफी मुफीद साबित हो सकती थी किंतु अब फॉन्‍ट का क्‍या करें। वह तो ऐसी गवाही भी है और  सुबूत भी जो मियां नवाज को पूरे परिवार सहित ले डूबा। हो सकता है कि इस दौर के कवि या कथाकार अब फॉन्‍ट की  असीमित ताकत को भी अपनी रचनाओं का हिस्‍सा बनाने पर विचार करें।

-सुमित्रा सिंह चतुर्वेदी    



गुरुवार, 20 जुलाई 2017

महिलाओं की FOP Leave: फेमिनिस्‍ट की इतनी हायतौबा क्‍यों ?

डिजिटल प्रगति अब हमारे समय का सच है इसलिए अब इसके बिना सामाजिक या आर्थिक प्रगति के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता।
नित नए प्रयोग हो रहे हैं, नया क्षेत्र होने के कारण इसके साथ आने वाली बाधाओं से निपटा भी जा रहा है, यथासंभव बदलाव भी किए जा रहे हैं।
फिलहाल ये बाधा एक बहस के रूप में हमारे सामने है, जिसे डिजिटल मैग्‍जीन Culture Machine ने शुरू किया है। अभी अभी खबर मिली है  कि मलयाली समाचार पत्र Mathrubhumi News ने भी महिला कर्मचारियों के लिए फर्स्ट डे लीव देने की घोषणा कर दी है ।
जी हां, मैग्‍जीन ने अपनी महिला कर्मचारियों के लिए उनकी माहवारी के पहले दिन पेड लीव #FOPLeave देने का फैसला किया है, मैग्‍जीन ने अपनी First Day of Period Policy (FOP) के तहत इस योजना को लागू करते हुए कहा कि इस एक दिन के ब्रेक से महिला कर्मचारियों की आफिस में कार्यक्षमता पर सकारात्‍मक प्रभाव पड़ेगा।
ज़ाहिर है कि इस एक अनोखे बदलाव को बहस का केंद्रबिंदु होना ही था।
मैं पत्रकार बरखा दत्‍त के कल लिखे गए उस लेख से असहमत हूं कि इस तरह महिलाओं को ‘और कमजोर’ दिखाकर मैग्‍जीन उनके लिए सहानुभूति बटोर रही है। बरखा दत्‍त का कहना है कि आजकल जब महिलाएं अपने दम पर उच्‍चस्‍थान हासिल कर रही हैं, तब मैग्‍जीन का यह कदम बेहद निराशा करता है।
बरखा ने अपना हवाला देते हुए लिखा है कि मैंने करगिल वार की रिपोर्टिंग अपने इसी ”पहले दिन” के चलते पूरी की थी और बखूबी की थी। निश्‍चित ही बरखा का कहना सही है कि काम में पहला दिन बाधा नहीं बनता और ना ही कमजोर बनाता है मगर एक बात तो सर्वथा सिद्ध है कि सभी महिलाओं का शरीर माहवारी के पहले दिन एक जैसा रिस्‍पांड नहीं करता, कुछ को असहनीय कष्‍ट होता है और कुछ को कम।
यहां बात पहले दिन होने वाले कष्‍ट को लेकर किसी तुलनात्‍मक अध्‍ययन की नहीं हो रही, यहां तो Culture Machine नामक मैग्‍जीन ने इस कष्‍ट पर सिर्फ अपना स्‍टैंड रखा है। इस स्‍टैंड के तहत वो महिलाएं जिन्‍हें पहले दिन असहनीय कष्‍ट होता है, वह पेड लीव ले सकती हैं और जिनके लिए उसे झेलना संभव है, वह काम पर आ सकती हैं। यह सुविधा है, न कि कोई शर्त। अब तक जो होता आया है, उसके अनुसार पहले दिन भी काम पर आना उनकी मजबूरी थी जिससे न केवल कार्यक्षमता पर असर पड़ना स्‍वाभाविक है बल्‍कि दर्द सहते हुए दबाववश काम करना अमानवीय भी है। मानवीयता तो यही कहती है कि किसी का कष्‍ट हम कम कर सकें तो जरूर करना चाहिए, और मैग्‍जीन ने वही किया है।
ऑफिस में काम करने वाली हर महिला जानती है कि उसने पहले दिन अगर कष्‍ट के कारण छुट्टी ली तो शारीरिक कष्‍ट के साथ-साथ उसे आर्थिक हानि भी उठानी पड़ेगी।
Culture Machine द्वारा महिलाओं के लिए शुरू की गई इस दोहरे लाभ वाली मानवीय सोच की योजना को कथित आधुनिक महिलाओं अथवा कथित महिला अधिकारवादियों द्वारा महिलाओं की क्षमता पर सवालिया निशान लगाने अथवा इसे उनकी कमजोरी बताने के रूप में ना देखकर बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य की संभावना के रूप में देखना चाहिए।
हार्डकोर फेमिनिस्‍ट्स इस तरह महिलाओं की नैसर्गिक प्रक्रिया को जबरन उनके सम्‍मान से तो जोड़ ही रही हैं, साथ ही उन्‍हें अमानवीय स्‍थितियों में काम करते रहने पर विवश करने की वकालत भी कर रही हैं।
हार्डकोर फेमिनिस्‍ट्स के ऐसे थोथे और निरर्थक विरोध से तो मैग्‍जीन अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर हो सकती है और दूसरे संस्‍थान भी अपने यहां ऐसा कोई प्राविधान लागू करने का विचार त्‍याग सकते हैं क्‍योंकि व्‍यावसायिक मजबूरियों और कार्य की जरूरतों को देखते हुए बहुत सी प्राइवेट कंपनियों तो ऐसा कोई विचार यूं भी नहीं करतीं।
बेशक हमें मालूम है कि रास्‍ते अब भी पुरख़तर हैं, महिलाओं को अपने अपने अधिकारों व कर्तव्‍यों के लिए हर स्‍तर पर लड़ना पड़ रहा है। पारिवारिक व सामाजिक मानदंडों के जितने चक्रव्‍यूहों को आए-दिन महिलाऐं चुनौती दे रही हैं, बाध्‍यताओं को अपने हौसले और ज़िद से हरा रही हैं, मर्यादाओं के नाम पर हो रहे शोषण के सामने खड़ी हो रही हैं, यह उस बदलाव का संकेत है जिसमें हार्डकोर फेमिनिस्‍ट्स के कुतर्क आड़े नहीं आने वाले।
महिलाओं को अच्‍छी तरह मालूम है कि उनके लिए बदलाव का यह जटिल समय है, ऐसा समय जिसमें उन्‍हें संभलना भी है और बहुत-कुछ संभालना भी है।
 
सेल्‍फ प्रूविंग के इस दौर में सभी महिलाओं को पता है कि माहवारी के पहले दिन का कष्‍ट कितने स्‍तर पर झेलना होता है। यदि महिला विवाहित और कामकाजी है तो उसे इस कष्‍ट को कई गुना अधिक झेलना होता है, वह भी सेल्‍फप्रूविंग के साथ।

ऐसे कष्‍ट के बीच मैग्‍जीन का एक दिनी सहयोग भी काफी हो सकता है अत: किसी संस्‍थान के सर्वथा मानवीय स्‍तर पर पहली बार उठाए गए इस कदम की सिर्फ और सिर्फ सराहना की जानी चाहिए, न कि उसे महिलाओं की किसी कमजोरी के रूप में प्रदर्शित करके सस्‍ती लोकप्रियता का हथियार बनाना चाहिए।

रहा सवाल बरखा दत्त के लेख का, तो वह किसी भी ऐसे मुद्दे को भुनाने में कभी पीछे नहीं रहतीं जिससे वह लाइम लाइट में आ सकें और यह भी बता सकें कि उन्‍होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कितने कथित झंडे गाढ़े हैं।
यह बात अलग है कि अपनी उपलब्‍धियों से वह वही जाहिर कराती हैं, जिसके विरोध का आडंबर करती हैं।
मसलन यहां वह ”महिला पत्रकार” होने का पूरा अहसास कराए बिना नहीं चूकतीं।

जैसा कि अपने लेख में भी उन्‍होंने यह लिखकर कराया है कि करगिल वार की रिपोर्टिंग उन्‍होंने अपने उस ”पहले दिन” ही की थी। अब पता नहीं, यह उनका दंभ है अथवा कमजोरी।

-  अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

धर्म की दीमकें

इस विषय पर मैं पहले भी काफी लिखती रही हूं और आज फिर लिख रही हूं क्‍योंकि यह विषय  मुझे हमेशा से न सिर्फ उद्वेलित करता रहा है बल्‍कि नए-नए सवाल भी खड़े करता रहा है।
व्‍यापारिक तौर पर बड़े टर्नओवर के नए वाहक बने सभी धर्मों के अनेक ऐसे धर्मगुरु और धार्मिक संस्‍थान  अपने अपने धर्म के मूलभाव को ही दीमक की तरह चाट जाने पर आमादा हैं जिसमें समाज  कल्‍याण का मूलभाव तिरेहित है इसीलिए सभी ही धर्मों के इस व्‍यापारिक रूप को लेकर सवाल  उठना लाजिमी है। 
चूंकि भारत की लगभग पूरी आबादी लगभग धर्मावलंबी है, हर एक व्‍यक्‍ति किसी ना किसी धर्म  को मानने वाला है और सभी धर्म, पाप से दूर रहने का संदेश देते हैं। हर धर्म में स्‍वर्ग और नरक  की परिभाषाएं भी विस्‍तार से दी गई हैं, इस सब के बावजूद सभी धर्मावलंबियों में इतना अधिक  गुस्‍सा, इतना स्‍वार्थ और इतना अनाचार क्‍यों है?
अपने ''अंडर'' लाखों- करोड़ों अनुयाई होने का दावा करने वाले धर्मगुरू भी इस नाजायज गुस्‍से के  दुष्‍परिणामों से अपने भक्‍तों को अवगत क्‍यों नहीं करा पा रहे।
क्‍यों धर्म ध्‍वजाएं सिर्फ सिर्फ मठ, मंदिर, मस्‍जिद और गिरिजाघरों की प्रतीक बनकर रह गई हैं,  क्‍यों वह मात्र इन धार्मिक स्‍थलों पर फहराने के काम आती हैं। जनकल्‍याण के लिए भी धर्म का  वास्तविक संदेश देने से परहेज क्‍यों किया जा रहा है।  पग-पग पर धार्मिक केंद्रों के होते हुए  दंगे-फसाद-अत्‍याचार-अनाचार-व्‍यभिचार आदि कैसे सर्वव्‍यापी हैं।

प्रश्‍न अनेक हैं परंतु उत्‍तर कमोवेश सभी का एक ही निकलता दिखता है कि धर्म की दुकानें तो  सजी हैं और उन दुकानों से अरबों-खरबों का कारोबार भी हो रहा है, इस कारोबार से बेहिसाब  चल-अचल संपत्‍तियां बनाने वाले भी बेशुमार हैं मगर धर्म ही ''मौजूद'' नहीं है। जाहिर है कि ऐसे  में कौन तो धर्म को समझाएगा और कौन उसका पालन करेगा।

सर्वविदित है कि जब बात ''धर्म'' से जोड़ दी जाती है तो धर्मावलंबियों और उनके अनुयाइयों की  सोच में लग चुकी दीमक को टैबू रखा जाता है और उसी सोच का महिमामंडन पूरी साजिश  के  तहत बदस्‍तूर चलता रहता है। सभी धर्माचार्यों और उनके अंधभक्‍तों की स्‍थिति इस मामले में  समान है। यहां तक कि राजनीतिक दल और सरकारें भी इसी लकीर पर चलती हैं और इनकी  आड़ में धर्म की गद्दियां अपने साम्राज्‍य का विस्‍तार करती जाती हैं।
चूंकि मैं स्‍वयं सनातनी हूं और दूसरे किसी धर्म पर मेरा टीका-टिप्‍पणी करना भी विवाद का विषय  बनाया जा सकता है इसलिए फिलहाल अपने ही धर्म में व्‍याप्‍त विसंगति का जिक्र करती हूं।

पिछले दिनों हमारे ब्रज का प्रसिद्ध मुड़िया पूर्णिमा मेला (गुरू पूर्णिमा मेला) सम्‍पन्‍न हुआ। हमेशा  की तरह लाखों लोगों ने आकर गिरराज महाराज यानि गोवर्धन की परिक्रमा कर ना केवल प्रदेश  सरकार के खजाने को भरा बल्‍कि उन गुरुओं के भी भंडार भरे जिन्‍होंने अपनी चरण-पूजा को  बाकायदा एक व्‍यवसाय का रूप दे रखा है। वैसे गुरू पूजन की परंपरा पुरानी है मगर अब इसकी  रीति बदल दी गई है, इसमें प्रोफेशनलिज्‍म आ गया है। गुरू पूर्णिमा आज के दौर में गुरुओं के  अपने-अपने उस नेटवर्क का परिणाम भी सामने लाता है जिससे शिष्‍यों की संख्‍या व उनकी  हैसियत का पता लगता है।

इन सभी गुरूओं का खास पैटर्न होता है, स्‍वयं तो ये मौन रहते हैं मगर इनके ''खास शिष्‍य'' ''नव  निर्मित चेलों'' से कहते देखे जा सकते हैं कि हमारे फलां-फलां प्रकल्‍प चल रहे हैं जिनमें गौसेवा,  अनाथालय, बच्‍च्‍ियों की शिक्षा, गरीबों के कल्‍याण हेतु काम किए जाते हैं, अत: कृपया हमारी  वेबसाइट पर जाऐं और अपनी ''इच्‍छानुसार'' प्रकल्‍प में सहयोग (अब इसे दान नहीं कहा जाता) दें,  इसके अतिरिक्‍त हमारे यूट्यूब चैनल को सब्‍सक्राइब करें ताकि अमृत-प्रवचनों का लाभ आप ले  सकें।

एक व्‍यवस्‍थित व्‍यापार की तरह गुरु पूर्णिमा के दिन बाकायदा टैंट...भंडारा...आश्रम स्‍टे...गुरू गद्दी  की भव्‍यता...गुरूदीक्षा आयोजन की भारी सजावट वाले पंडाल का पूरा ठेका गुरुओं के वे कथित  शिष्‍य उठाते हैं जो न केवल अपना आर्थिक बेड़ापार करते हैं बल्‍कि बतौर कमीशन गुरुओं के  खजाने में भी करोड़ों जमा करवाते हैं। देशज और विदेशी शिष्‍यों में भेदभाव प्रत्‍यक्ष होता है  क्‍योंकि विदेशी मुद्रा और विदेशों में गुरु के व्‍यापारिक विस्‍तार की अहमियत समझनी होती है।
सूत्र बताते हैं कि नोटबंदी-जीएसटी के भय के बावजूद ब्रज के गुरुओं के ऑनलाइन खाते अरबों  की गुरूदक्षिणा से लबालब हो चुके हैं और इनमें उनके चेलों, ठेकेदारों और कारोबारियों का लाभ  शामिल नहीं है।

भगवान श्रीकृष्‍ण के वर्तमान ब्रज और इसकी छवि को ''चमकाने वाले'' अधिकांश धर्मगुरुओं का तो  सच यही है, इसे ब्रज से बाहर का व्‍यक्‍ति जानकर भी नहीं जान सकता, वह तो ''राधे-राधे'' के  नामजाप में खोया रहता है। 

हमारी यानि ब्रजवासियों की विडंबना तो देखिए कि हम ना इस सच को निगल पा रहे हैं और ना  उगल पा रहे हैं जबकि इन पेशेवर धर्मगुरूओं से छवि तो ब्रज की ही धूमिल होती है।

बहरहाल, खालिस व्‍यापार में लगे इन धर्मगुरुओं का धर्म-कर्म यदि कुछ प्रतिशत भी समाज में  व्‍याप्‍त गुस्‍से, कुरीतियों और बात-बात पर हिंसा करने पर आमादा तत्‍वों को समझाने में, उनकी  सोच को सकारात्‍मक दिशा देने में लग जाए तो बहुत सी जघन्‍य वारदातों और दंगे फसादों को  रोका जा सकता है।

जहां तक बात है जिम्मेदारी की तो बेहतर समाज सबकी साझा जिम्‍मेदारी होती है।
सरकारें लॉ एंड ऑर्डर संभालने के लिए होती हैं मगर समाज में सहिष्‍णुता और जागरूकता के  लिए धर्म का अपना बड़ा महत्‍व है। गुरू पूर्णिमा हो या कोई अन्‍य आयोजन, ये धर्मगुरू  समाजहित में कुछ तो बेहतर योगदान दे ही सकते हैं और इस तरह धर्म की विकृत होती छवि  को बचाकर समाज कल्‍याण का काम कर सकते हैं।

संस्‍कृत के एक श्‍लोक में कहा गया है कि धर्मो रक्षति रक्षितः अर्थात तुम धर्म की रक्षा करो, धर्म  तुम्हारी रक्षा करेगा| इसे इस प्रकार भी परिभाषित किया जा सकता है कि “धर्म की रक्षा करो,  तुम स्वतः रक्षित हो जाओगे| इस एक पंक्ति “धर्मो रक्षति रक्षितः” में कितनी बातें कह दी गईं हैं  इसे कोई स्वस्थ मष्तिष्क वाला व्यक्ति ही समझ सकता है|

अब समय आ गया है कि धर्म गुरुओं को यह बात समझनी होगी। फिर चाहे वह किसी भी धर्म  से ताल्‍लुक क्‍यों न रखते हों, क्‍योंकि निजी स्‍वार्थों की पूर्ति के लिए धर्म को व्‍यावसायिक रुप  प्रदान करने में कोई धर्मगुरू पीछे नहीं रहा है। गुरू पूर्णिमा तो एक बड़े धर्म का छोटा सा  उदाहरणभर है।

- अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 30 जून 2017

वैचारिक हिंसा का प्रायोजित प्रदर्शन #NotInMyName


ये बदहवास सा वक्‍त हमारी रूहों के गिर्द कुछ इस तरह चस्‍पा किया जा चुका है कि तमाम  कोशिशें नाकाफी मालूम पड़ती हैं, बावजूद इसके हम मायूस नहीं हैं, कतई नहीं। ऐसा लगता है  कि हम जितना आगे जाने की कोशिश करते हैं, उतनी ही हमारी टांगें पीछे की ओर खींचने  वाले पहले से ताक लगाए बैठे हैं।

जंतर-मंतर पर बुधवार को एक खास वर्ग द्वारा #NotInMyName अभियान के ज़रिये देशभर  में व्‍याप्‍त उस हिंसक ''माहौल के खिलाफ प्रदर्शन'' किया गया जिसे यह वर्ग ''प्रायोजित हिंसा''  मानता है। और यह भी मानता है कि इस हिंसा को सरकारी संरक्षण प्राप्‍त है। खासकर केंद्र की  मोदी सरकार का और उन प्रदेश की भाजपा शासित सरकारों का।  

प्रदर्शनकारियों में वो सारे लोग भी शामिल थे जो बीफ खाने के पक्षधर हैं और इस माहौल को  अपनी और अपनी जैसी पूर्वाग्रही ''सेक्‍यूलर सोच'' वाले कथित इलीट पत्रकारों के दृष्टिकोण से  परिभाषित करते हुए हैशटैग चलाते हैं। 
ये प्रदर्शनकारी ''भीड़ द्वारा हत्‍या'' किए जाने की घटनाओं के खिलाफ आधे सच के साथ अपना  पक्ष रख रहे थे क्‍योंकि पूरा सच वो बोल नहीं सकते।
क्‍योंकि पूरा सच उनकी कुत्‍सित सोच और उनके इलीट वर्ग द्वारा भाजपा के नेतृत्‍व वाली  सरकारों के खिलाफ रची जा रही सुनियोजित साजिश को सामने ला सकता है। वे सिर्फ उन  घटनाओं का ज़िक्र कर रहे थे जिसमें कथित गौरक्षकों का टारगेट कोई न कोई मुस्‍लिम बना था  और जिसके सहारे बड़ी सहजता के साथ दक्षिणपंथी राजनीति को जोड़ा जा सकता था। वो उन  घटनाओं का जि़क्र नहीं कर रहे थे जिसमें भीड़ की हिंसक प्रवृत्‍ति का शिकार सामान्‍य वर्ग के  लोग हुए। वो उस घटना का भी जिक्र नहीं कर रहे थे जिसमें जम्‍मू कश्‍मीर पुलिस के डीएसपी  अब्‍दुल अयूब पंडित की जान ले ली गई। ये प्रदर्शनकारी उन हिन्‍दुओं की बेरहम हत्‍याओं पर  भी चुप थे जो केरल में मुस्‍लिमों द्वारा लगातार की जा रही हैं।

भीड़ तो वह भी हत्‍यारी ही कही जाएगी जो किसी महिला को डायन कहकर उसे मार डालती है  किंतु क्राइम और क्राइम की मानसिकता को खांचों में बांटकर देखे जाने के कारण ही अब  स्‍थितियां इतनी भयावह हो गई हैं कि गौ पालने वाले मुस्‍लिम को भी गौहत्‍यारों के रूप में  प्रचारित किया जा रहा है तथा गायों की रक्षा करने के नाम पर गेरुआ वस्‍त्र व टीका लगाकर  रहने वाले अपराधियों को गौरक्षक, लेकिन डायन बताकर निरीह महिलाओं की हत्‍या को  सामान्‍य अपराध की श्रेणी में रखा जाता है।

जहां तक बात है गौभक्‍ति की, तो गौभक्‍ति की आड़ में किसी इंसान की हत्‍या को सही सिद्ध  नहीं किया जा सकता लिहाजा प्रदर्शन अपराधी मानसिकता के खिलाफ होने चाहिए, न कि  राजनीति चमकाने के लिए मोदी सरकार अथवा दक्षिणपंथी सरकारों के खिलाफ।

पूर्वाग्रह से ग्रस्‍त ऐसे विरोध इसीलिए दिल्‍ली में जंतर-मंतर तक ही सिमटे रहते हैं और चंद  घंटों अथवा चंद दिनों में दिमाग से निकल जाते हैं। कुछ एनजीओ को सामने लाकर  एनडीटीवी  की ऐसे प्रदर्शनों में सहभागिता बताती है कि इससे व्‍यावसायिक व राजनैतिक वजहें भी जुड़ी  हैं।

बहरहाल, #NotInMyName अभियान में शामिल तत्‍वों ने अपने विचारों से यह ज़ाहिर करा  दिया कि उनकी पूरी कवायद मौजूदा केंद्र सरकार के खिलाफ थी, ना कि हिंसक घटनाओं के  खिलाफ क्‍योंकि इन लोगों के अनुसार हिंसा का यह माहौल 2015 के बाद से बना है और  2014 में मोदी की सरकार बनने के साथ इसकी शुरूआत हुई है।
गौरतलब है कि 2015 में बीफ रखने की आशंका के मद्देजनर गाजियाबाद निवासी अखलाक की  हत्‍या कर दी गई थी।

अखलाक की हत्‍या के बाद से लगातार ये खास वर्ग कुछ-कुछ समय के अंतराल पर किसी न  किसी घटना को मुद्दा बनाकर प्रदर्शन करता रहा है। इस बार के प्रदर्शन का मुद्दा भीड़ द्वारा  सिर्फ मुस्‍लिमों की हत्‍या किए जाना बनाया गया।

मुठ्ठीभर प्रदर्शनकारियों के सहारे प्रदर्शन के प्रायोजक टीवी चैनल्‍स यह भी दर्शाने की कोशिश  कर रहे थे कि पूरे देश में ऐसी ''हिंसा'' के खिलाफ जबर्दस्‍त गुस्‍सा है मगर वे यह भूल गए कि  न तो वामपंथ के नजरिए से पूरा देश देखता है और न दिल्‍ली के जंतर-मंतर पर इकठ्ठा होने  वाले खास सोच के लोग पूरे देश का प्रतिनिधित्‍व करते हैं।
जिस मीडिया और सोशल मीडिया को माध्‍यम बनाकर वो ''देश में अभिव्‍यक्‍ति की आजादी ना  होने'' का कथित सच दिखा रहे थे, वह भी सिक्‍के का एक ही पहलू है।

उनके इस सच का दूसरा पहलू शाम होते-होते कन्‍हैया कुमार व उमर खालिद की उपस्‍थिति के  रूप में सबके सामने आ गया और सोशल मीडिया को भी पता लग गया कि कितने दोगलेपन  के साथ चलाया जा रहा था #NotInMyName अभियान। सोशल मीडिया के ही माध्‍यम से ऐसी  सेल्‍फी और तस्‍वीरें भी सामने आईं जिनमें उमर खालिद मुस्‍कुराकर अपने ''प्रशंसकों'' को ''पोज''  दे रहा था।

कुछ गंभीर प्रश्न उमर खालिद और कन्‍हैया कुमार की उपस्‍थिति और मुस्‍कुराकर सेल्‍फी लेने से  उभरते हैं। जैसे अगर ये अभियान भीड़ द्वारा मुस्‍लिमों की हत्‍या की भर्त्‍सना के लिए चलाया  जा रहा था तो इसमें कोई हिन्‍दू विक्‍टिम शामिल क्‍यों नहीं था। उसमें केरल के आरएसएस  कार्यकर्ताओं की हत्‍या को स्‍थान देने से क्‍यों परहेज किया गया। धार्मिक भावनाएं तो उनके  साथ भी जुड़ी होती हैं।

जंतर-मंतर के वामपंथी प्रदर्शनकारियों और उनके प्रायोजक टीवी एंकर्स  को 1984 के सिख विरोधी दंगे भी याद तो जरूर होंगे। इन दंगों में मारे गए हजारों निर्दोष  सिखों के परिजन आज तक उनके और अपने गुनाह की वजह पूछते फिर रहे हैं।  शासन-प्रशासन से लेकर न्‍यायपालिकाओं तक की चौखट पर पगड़ी रख रहे हैं। सात समंदर पार  से भी आवाजें बुलंद कर रहे हैं किंतु उनके लिए कोई तथाकथित बुद्धिजीवी न तो प्रदर्शन करता  है और न अपने अवार्ड लौटाता है क्‍योंकि इन बुद्धिजीवियों की नजर में वह कोई हिंसा नहीं थी।  उस हिंसा के शिकार इंसान नहीं, एक कौम भर थे। ऐसी कौम जिससे राजनीति के तवे पर  रोटी सेंकने का वक्‍त गुजर गया। बस लकीर पीटी जा रही है, और वह भी पीड़ित परिवारों  द्वारा। उस नरसंहार के राजनीतिक हित जितने पूरे हो सकते थे, हो चुके। वह आउटडेटेड हो  चुका है। ताजा मुद्दा दक्षिणपंथी सत्‍ता पर चोट करने का है।

मुझे तो हास्‍यास्‍पद ये भी लगा कि आत्‍ममुग्‍धता के शिकार एनडीटीवी के कथित बुद्धिजीवी  पत्रकार रवीश कुमार प्रदर्शन में भाग लेने वाली रामजस कॉलेज की छात्राओं से पूछ रहे थे कि  क्‍या आपको डर लगता है?
रवीश को कौन समझाए कि डरे हुए लोग घरों की चारदीवारी के अंदर दरवाजे बंद करके रहते  हैं न कि सरकार विरोधी तख्तियों के साथ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की पिकनिक में शामिल होते  हैं।

सच तो यह है कि मुसलमानों को मिला ये कथित राजनैतिक विशिष्‍टता का दर्जा ही  हिन्‍दू-मुस्‍लिम के बीच दिन-प्रतिदिन खाई चौड़ी करने का काम कर रहा है और इसी की  परिणति है कि अपराधियों की भीड़ को भी धर्म के आधार पर रेखांकित किया जाने लगा है।

विक्‍टिम चाहे मुस्‍लिम हो या फिर हिंदू, वह सिर्फ विक्‍टिम होता है और न्‍याय का सिद्धांत  उसका धार्मिक विभाजन करने की इजाजत नहीं देता।

इस माहौल में जब कि प. बंगाल, केरल और कश्‍मीर से लेकर मध्‍य भारत तक वैचारिक,  मानसिक एवं राजनैतिक खलबली मची हुई है, ''आलम खुर्शीद'' की ये नज्‍़म एकदम फिट बैठती  है- 

दरवाज़े पर दस्तक देते डर लगता है
सहमा-सहमा-सा अब मेरा घर लगता है

साज़िश होती रहती है दीवार ओ दर में
घर से अच्छा अब मुझको बाहर लगता है

झुक कर चलने की आदत पड़ जाए शायद
सर जो उठाऊँ दरवाज़े में सर लगता है

क्यों हर बार निशाना मैं ही बन जाता हूँ
क्यों हर पत्थर मेरे ही सर पर लगता है

ज़िक्र करूँ क्या उस की ज़ुल्म ओ तशद्दुद का मैं
फूल भी जिसके हाथों में पत्थर लगता है

लौट के आया हूँ मैं तपते सहराओं से
शबनम का क़तरा मुझको सागर लगता है

ठीक नहीं है इतना अच्छा बन जाना भी
जिस को देखूँ वो मुझ से बेहतर लगता है

इक मुद्दत पर आलम बाग़ में आया हूँ मैं
बदला-बदला-सा हर इक मंज़र लगता है।

यह नज्‍़म इसलिए फिट बैठती है कि इसे धर्म, जाति तथा संप्रदाय के खांचों में बांटकर नहीं  लिखा गया। इसे हर उस सामान्‍य नागरिक के नजरिए से लिखा गया है जो हर हिंसक प्रवृत्‍ति  से डरता है। फिर चाहे वो हिंसा मानसिक हो या शारीरिक, राजनीतिक हो या कूटनीतिक।
गांधी बापू ने यूं ही नहीं कहा था कि हिंसा का तात्‍पर्य सिर्फ हथियार से ही नहीं होता, वैचारिक  हिंसा हथियारों की हिंसा से कहीं अधिक घातक और कहीं अधिक मारक होती है।
  
- अलकनंदा सिंह

रविवार, 25 जून 2017

इमरजेंसी पर आज बस इतने ही हैं शब्‍द


इमरजेंसी पर आज बस इतना ही कह सकती हूं  कि…इतिहास की एक घटना जिसने भारतवर्ष की  राजनैतिक दिशा-दशा, आरोह-अवरोह, घटना-परिघटना,  विचारधाराओं का विचलन और समन्‍वय के साथ-साथ  हमारी पीढ़ियों को लोकतंत्र की उपयोगिता व संघर्ष को  बखूबी परिभाषित कर दिया….उसे शब्‍दों में समेटा नहीं  जा सकता।
इमरजेंसी के दौरान राजनेताओं और उनके समर्थकों पर  क्‍या गुजरी यह तो नहीं बता सकती मगर चूंकि मेरे  पिता सरकारी डॉक्‍टर थे…सो नसबंदियों की अनेक  ”सच्‍चाइयां” उनके मुंह से गाहेबगाहे सुनीं जरूर हैं और  इस नतीजे पर पहुंची हूं कि किसी भी सर्वाधिकार  सुरक्षित रखने वाले सत्‍ताधीश का ”अहं” जब सीमायें  लांघता है तो वह अपने और अपने परिवार के लिए  इतनी बददुआऐं-आलोचनाएं इकठ्ठी कर लेता है जिसे  सदियों तक एक ”काली सीमारेखा” के रूप में परिभाषित  किया जाता है। ऐसा ही इमरजेंसी की घोषणा करते  वक्‍त पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था और आज  गांधी परिवार के लिए हर वर्ष की 25 जून को सिवाय  भर्त्‍सनाओं के पूरे देश से और कुछ नहीं आता।
बहरहाल आप देखिए ये ”दो उदाहरण”
पहला है वो फोटो जो इंदिरा गांधी के लिए ही नहीं  लोकतंत्र का मजाक उउ़ाने वाले किसी भी नेता के लिए  हमेशा याद किया जाता रहेगा। जी हां, जगमोहन लाल  सिन्हा का फोटो…
justice-jagmohan-sinha
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल  सिन्हा का फोटो जिन्‍होंने 1975 में यू.पी. बनाम राज  नारायण मामले में कहा था ” “याचिका स्वीकृत की  जाती है, जिसका मतलब था “मिसेज़ गाँधी अनसीटेड.”
एक ऐतिहासिक दस्‍तावेज के अनुसार जगमोहन लाल  सिन्हा ने इस तरह की केस की सुनवाई ——
12 जून, 1975 की सुबह इंदिरा गांधी के वरिष्ठ निजी  सचिव एनके सेशन एक सफ़दरजंग रोड पर प्रधानमंत्री  निवास के अपने छोटे से दफ़्तर में टेलिप्रिंटर से आने  वाली हर ख़बर पर नज़र रखे हुए थे. उनको इंतज़ार था  इलाहाबाद से आने वाली एक बड़ी ख़बर का और वो  काफ़ी नर्वस थे.
ठीक 9 बजकर 55 मिनट पर जस्टिस जगमोहन लाल  सिन्हा ने इलाहाबाद हाइकोर्ट के कमरा नंबर 24 में  प्रवेश किया. जैसे ही दुबले पतले 55 वर्षीय, जस्टिस  सिन्हा ने अपना आसन ग्रहण किया, उनके पेशकार ने  घोषणा की, “भाइयो और बहनो, राजनारायण की  याचिका पर जब जज साहब फ़ैसला सुनाएं तो कोई  ताली नहीं बजाएगा.”
जस्टिस सिन्हा के सामने उनका 255 पन्नों का  दस्तावेज़ रखा हुआ था, जिस पर उनका फ़ैसला लिखा  हुआ था.
जस्टिस सिन्हा ने कहा, “मैं इस केस से जुड़े हुए सभी  मुद्दों पर जिस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ, उन्हें पढ़ूंगा.” वो  कुछ पलों के लिए ठिठके और फिर बोले, “याचिका  स्वीकृत की जाती है, “मिसेज़ गाँधी अनसीटेड.”
अदालत में मौजूद भीड़ को सहसा विश्वास नहीं हुआ  कि वो क्या सुन रही है. कुछ सेकंड बाद पूरी अदालत  में तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी. सभी रिपोर्टर्स अपने  संपादकों से संपर्क करने बाहर दौड़े.
वहाँ से 600 किलोमीटर दूर दिल्ली में जब एनके सेशन  ने ये फ़्लैश टेलिप्रिंटर पर पढ़ा तो उनका मुंह पीला पड़  गया.
उसमें लिखा था, “मिसेज़ गाँधी अनसीटेड.” उन्होंने  टेलिप्रिंटर मशीन से पन्ना फाड़ा और उस कमरे की ओर  दौड़े जहाँ इंदिरा गाँधी बैठी हुई थीं.
इंदिरा गाँधी के जीवनीकार प्रणय गुप्ते अपनी किताब  ‘मदर इंडिया’ में लिखते हैं, “सेशन जब वहाँ पहुंचे तो  राजीव गांधी, इंदिरा के कमरे के बाहर खड़े थे. उन्होंने  यूएनआई पर आया वो फ़्लैश राजीव को पकड़ा दिया.  राजीव गांधी पहले शख़्स थे जिन्होंने ये ख़बर सबसे  पहले इंदिरा गाँधी को सुनाई.”
1971 में रायबरेली सीट से चुनाव हारने के बाद  राजनारायण ने उन्हें हाई कोर्ट में चुनौती दी थी.
जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी को दो मुद्दों पर चुनाव में  अनुचित साधन अपनाने का दोषी पाया. पहला तो ये  कि इंदिरा गांधी के सचिवालय में काम करने वाले  यशपाल कपूर को उनका चुनाव एजेंट बनाया गया  जबकि वो अभी भी सरकारी अफ़सर थे.
उन्होंने 7 जनवरी से इंदिरा गांधी के लिए चुनाव प्रचार  करना शुरू कर दिया जबकि 13 जनवरी को उन्होंने  अपने पद से इस्तीफ़ा दिया जिसे अंतत: 25 जनवरी  को स्वीकार किया गया.
जस्टिस सिन्हा ने एक और आरोप में इंदिरा गांधी को  दोषी पाया, वो था अपनी चुनाव सभाओं के मंच बनवाने  में उत्तर प्रदेश के अधिकारियों की मदद लेना. इन  अधिकारियों ने कथित रूप से उन सभाओं के लिए  सरकारी ख़र्चे पर लाउड स्पीकरों और शामियानों की  व्यवस्था कराई.
हांलाकि बाद में लंदन के ‘द टाइम्स’ अख़बार ने टिप्पणी  की, “ये फ़ैसला उसी तरह का था जैसे प्रधानमंत्री को  ट्रैफ़िक नियम के उल्लंघन करने के लिए उनके पद से  बर्ख़ास्त कर दिया जाए.”
और अब दूसरा उदाहरण है अटल जी की कविता-
इमरजेंसी के कालेरूप को अपने शब्‍दों में ढालकर हमारे  सामने लाई गई अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक  कविता पढ़िए जिसे आज प्रधानमंत्री ने अपने ”मन की  बात” कार्यक्रम में शेयर किया है। किसी भी जो  इमरजेंसी की भयावहता को बखूबी दर्शा सकते हैं अटल  जी के ये शब्द …आप भी पढ़िए-
एक बरस बीत गया
 
झुलासाता जेठ मास
शरद चांदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया
 
सीकचों मे सिमटा जग
किंतु विकल प्राण विहग
धरती से अम्बर तक
गूंज मुक्ति गीत गया
एक बरस बीत गया
 
पथ निहारते नयन
गिनते दिन पल छिन
लौट कभी आएगा
मन का जो मीत गया
एक बरस बीत गया।
अब इस दुआ के साथ कि भारत को कभी कोई और  इमरजेंसी न झेलनी पड़े, बेहतर हो कि हम अपने  इतिहास को याद रखें।
  • अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 8 जून 2017

बच्चे हैं तो क्यों शौक से मिट्टी नहीं खाते

मुनव्‍वर राणा साहब लिखते हैं कि -

सो जाते हैं फुटपाथ पे अखबार बिछाकर,
मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाते...


ये अशआर पढ़ते हुए हम भूल जाते हैं कि अब हमें उल्‍टे कदमों पर चलना सिखाया जा रहा है  और ये प्रयास पूरी सफलता के साथ आगे बढ़ रहा है। जी हां, तनाव का एक भरापूरा बाजार  क्रिएट किया जा चुका है, आवश्‍यकताओं की मार्केटिंग में रिसर्च, प्रोडक्‍ट और कंज्‍यूमर तक पहुंचने  की ट्रिक्‍स बताई जाने लगी हैं। हर हाल में इस बात से बचा जा रहा है कि हम अपनी जड़ों की  ओर ना देख सकें क्‍योंकि क्रिएटेड माहौल के साथ हमें अपनी जड़ों से जितना विमुख किया जा  सकेगा, उतना ही मार्केट के ज़रिए हम कैप्‍चर हो सकेंगे यानि उसके Addicted Consumer बन  सकेंगे।

मार्केटिंग के इसी घमासान के बीच 21 जून को योग दिवस मनाया जा रहा है, देश से लेकर  विदेश तक योग की माया और महिमा फैल रही है।

कितना अजीब लगता है कि अब सरकारों को हमें योग सिखाना पड़ रहा है, योग जो घर-घर में  सूर्य प्रणाम और सूर्य को अर्घ्‍य से सूर्यासन तक अपना विस्‍तार पाता था, आज उसी योग के  माध्‍यम से शरीर को स्‍वस्‍थ रखने की अपील सरकारों को करनी पड़ रही है। इस 21 जून के आते  आते तो योग पर रोजाना लेक्‍चर भी होंगे और संकल्‍प भी लिए जाऐंगे मगर 21 जून के बाद  अगले वर्ष की 21 जून तक जिंदगी फिर उसी ढर्रे पर आ जाएगी ज़िंदगी... जड़ों से कटने का  इससे बड़ा और वीभत्‍स उदाहरण दूसरा कोई हो सकता है क्‍या।
यह हमें पुरातन कथाओं में सुनाया जाता रहा है कि जो पौधे हमेशा आसमान की ओर ऊर्ध्‍वगति  से बढ़ते दिखाई देते हैं उनकी जड़ें उन्‍हें उतना ही अधिक मजबूती के साथ पृथ्‍वी से जोड़े रखती हैं  इसीलिए वे अपना वर्तमान और भविष्‍य दोनों ही पृथ्‍वी और आकाश से पोषित करते हैं। तभी  पौधों को वृक्ष बनने के लिए किसी मार्केटिंग की जरूरत नहीं पड़ती।

आज दो शोध रिपोर्ट पढ़ीं, एक में कहा गया है कि ''Dirt is Good'' और दूसरी में बताया गया कि  ''Sleep Therapy'' से वजन कम होता है। दोनों ही रिपोर्ट हमें उन जड़ों की याद दिलाती हैं  जिसमें धूल में खेलना बच्‍चों का शगल माना जाता था और बच्‍चे धूल में खेल कर ही बड़े हो जाते  थे बिना किसी क्रोनिक डिसीज के। विडंबना देखिए कि अब लाखों रुपए शोध पर खर्च कर यह  बताया जा रहा है कि बच्‍चे यदि धूल में खेलेंगे तो उन्‍हें एलर्जी, अस्‍थमा, एक्‍जिमा और डायबिटीज  जैसे रोग नहीं होंगे।

दूसरी शोध रिपोर्ट कहती है कि अच्‍छी नींद से वजन कम होता है, ये बिल्‍कुल नाक को घुमाकर  पकड़ने वाली बात है। अच्‍छी नींद के लिए बहुत आवयश्‍क है शारीरिक मेहनत करना और जब  व्‍यक्‍ति शारीरिक तौर पर मेहनत करेगा तो पूरे शरीर की मांसपेशियां थकेंगीं, निश्‍चित ही  मानसिक तौर पर भी थकान होगी और नींद अच्‍छी आएगी। नींद अच्‍छी आएगी तो मोटापा हावी  नहीं होगा। हास्‍यास्‍पद लगता है कि जब ऐसी रिपोर्ट्स को ''शोधार्थियों की अनुपम खोज'' कहा  जाता है।

इन दोनों ही शोधकार्यों पर मुनव्‍वर राणा के ये अशआर बिल्‍कुल फिट बैठते हैं कि-

''हंसते हुए माँ-बाप की गाली नहीं खाते,
बच्चे हैं तो क्यों शौक से मिट्ठी नहीं खाते।


सो जाते हैं फुटपाथ पे अखबार बिछाकर,
मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाते।।''


बहरहाल, अपनी जड़ों से दूर भागते हम लोग इन शोधकार्यों के बूते अपना जीवन जीने पर  इसलिए विवश हुए हैं कि हमने योग और पारंपरिक जीवनशैली से पूरी तरह दूरी बना ली है। अब  उस तक वापस लौटने के लिए बाजार का सहारा लेना पड़ रहा है, नींद की गोलियां और फैटबर्निंग  टैबलेट्स लेनी पड़ रही हैं। बच्‍चों को अस्‍थमा-डायबिटीज जैसी बीमारियां हमारी ही देन है।
 

इससे भी ज्‍यादा शर्मनाक बात ये है कि योग करने और स्‍वस्‍थ रहने लिए सरकारों को आगे आना  पड़ रहा है। अभी सिर्फ देरी हुई है, दूरी नहीं बनी...इसलिए अब भी समय है कि हम अपनी जड़ों  की ओर... अपनी पारंपरिक जीवन शैली की ओर लौट लें, आधुनिकता से जिऐं मगर इसके दास  ना बनें तभी तो योग शरीर के साथ मन को भी स्‍वस्‍थ रख पाएगा, वरना बाजार तो हमें कैप्‍चर  करने को करोड़ों के वारे-न्‍यारे कर ही रहा है ताकि हम उसके सुरसा जैसे मुंह में समा जाएं।
 

-अलकनंदा सिंह

रविवार, 4 जून 2017

पूर्वाग्रही राजनीति की भेंट चढ़ता संविधान का अनुच्‍छेद 48

पूर्वाग्रह व्‍यक्‍ति के प्रति हों, समाज के प्रति अथवा राजनैतिक पार्टी के प्रति, किसी  भी विषय पर तिल का ताड़ बनाने और उसी आधार पर शंकाओं को वास्तविकता  जैसा दिखाने का माद्दा रखते हैं। रस्‍सी को सांप बनाकर पेश करने की यह ज़िद  किसी के लिए भी अच्‍छी नहीं होती। यही पूर्वाग्रह रीतियों को कुरीतियों में और  सुशासन को कुशासन में बदलते दिखाई देते हैं।
आजकल ”बीफ” के बहाने बड़ी हायतौबा हो रही है। जैसे गौमांस नहीं खाऐंगे तो  मर जाएंगे अथवा अस्‍मिता पर संकट छा जाएगा। पशु बाजार के रेगुलेशन पर जो केंद्र सरकार ने नोटिफिकेशन जारी किया है, उसे कुछ राजनैतिक पूर्वाग्रहियों ने आजकल ”बीफ” खाने की ज़िद बना लिया है।
क्‍या  कहता  है  संविधान
संविधान का अनुच्‍छेद 48 कहता है कि ”राज्‍य, कृषि व पशुपालन दोनों को आधुनिक व वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने को प्रयास करेगा, विशिष्‍ट गायों बछड़ों और अन्‍य दुधारू पशुओं की नस्‍लों में सुधार के साथ-साथ उनके वध पर रोक लगाने के लिए कदम उठाएगा।” केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना महज इसलिए की जाए कि वह गैरकांग्रेसी और अपार बहुमत वाली सरकार है, तो यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं, वह भी तब जबकि संविधान के उक्‍त अनुच्‍छेद को ना तो भाजपा ने बनाया ना तब नरेंद्र मोदी ही राजनीति में आए थे। इसी अनुच्‍छेद में गाय को भारतीय संस्कृति का वाहक माना गया है। तो क्‍या जिन सिरफिरों ने केरल के कन्‍नूर में गाय के बछड़े के साथ जो वीभत्‍सता दिखाई, वह संविधान के इसी अनुच्‍छेद का उल्‍लंघन नहीं माना जाना चाहिए।

फिलहाल के विवाद में पशु बाजार को लेकर सरकार ने जो नए नियम बनाए हैं, उन्हें इस ”बीफ” विवाद ने परोक्ष कर दिया है जबकि नए नियमों में जानवरों की तस्करी और निर्दयता के पहलुओं पर काफी गौर किया गया है।

गौरतलब है कि 23 मई को जब केंद्र सरकार ने पशु बाजार के लिए नए नियमों की  घोषणा की तभी से कुछ तत्‍व केरल व पश्‍चिम बंगाल में बीफ को हाइलाइट करके बवाल काट रहे हैं। हालांकि ये समझ से परे है कि केरल में सिर्फ मांस ”निर्यात” करने वाले बूचड़खानों को लाइसेंस मिला हुआ है तो उन्‍हें दिक्‍कत क्‍यों हो रही है।
यूं भी गतवर्षों से जो घटनाऐं सामने आ रही हैं उनके आधार पर ये कहा जा सकता  है कि केरल को तो किसी को मारने की ”वजह” भी तलाशने की जरूरत नहीं, वहां  तो कुत्ते, गाय, औरत, बच्चे, हाथी और राजनैतिक कार्यकर्ताओं का कत्ल होता  आया है।

पश्चिम बंगाल ने भी मवेशियों की खरीद-फरोख्त को लेकर हो-हल्ला मचाया मगर  उतना नहीं जितना केरल में हुआ, तमिलनाडु में भी नए नोटिफिकेशन को लेकर  थोड़ा बहुत हंगामा हुआ। इसकी बड़ी वजह ये है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु  में ही पशुओं का सबसे ज्यादा अवैध कारोबार होता है। जहां पश्चिम बंगाल से  बांग्लादेश को गर्भवती गायों, बीमार और छोटे जानवरों की अवैध सप्लाई होती है  वहीं तमिलनाडु यही काम केरल के लिए करता है।

नेताओं और छात्र संगठनों ने पशुओं को लेकर जिन नए नियमों पर बयानबाजी की, वह बेहद ही खोखली थी। ये जिस तबके से आते हैं…निश्‍चित जानिए कि इनमें से तमामों ने तो कभी पशु् बाजार की ओर देखा भी नहीं होगा। ये बयानबाजी सिर्फ  सियासी तूफान खड़ा करने के लिए हुई और अब भी हो रही है, इस के चक्कर में  जो नए नियम बनाए हैं उनकी भी हत्या कर दी गई।

अब देखिए कि आखिर पशु बाजारों पर लगाम लगाना क्यों है जरूरी है। पहले हमें  इन बाजारों को नियमित करने की जरूरत को समझना होगा। पशु बाजारों में सिर्फ  दो तरह के जानवर बेचने के लिए लाए जाते हैं। पहले तो वो जो दुधारू होते हैं या  जिन्हें खेती के काम में इस्तेमाल किया जा सकता है, दूसरे वो जो मांस के लिए  बेचे जाते हैं।

यहां यह बात भी जान लेना जरूरी है कि जो उपयोगी जानवर होते हैं उनकी ठीक से  देख-रेख भी की जाती है और उन्हें लाने-ले जाने में भी अपेक्षाकृत कम क्रूरता दिखाई  जाती है, उनकी तस्करी भी कम होती है। इसकी वजह ये है कि उन्हें आसानी से  खरीदार मिल जाते हैं और उनकी सेहत का मालिकों को खयाल रखना पड़ता है, तभी  तो उन जानवरों की अच्छी कीमत मिल सकेगी।

इसके ठीक विपरीत जो जानवर मांस के लिए बेचने लाए जाते हैं, उनकी हालत बेहद  खराब होती है। किसान आम तौर पर वो जानवर मांस के लिए बेचते हैं, जो उनके  लिए बेकार हो चुके होते हैं।

किसान इन जानवरों को दलालों को बेच देते हैं। फिर ये दलाल दर्जन भर या इससे  ज्यादा जानवर खरीदते हैं जिन्‍हें वो बड़े बाजारों में ले जाते हैं, ताकि बड़े दलालों को  बेच सकें। कई बिचौलियों और बाजारों से गुजरते हुए ये जानवर इकट्ठे करके गाड़ियों  में ठूंस करके दूसरे राज्यों में ठेकेदारो को बेचे जाते हैं।
उत्तरी भारत के राज्यों में सबसे ज्यादा जानवर पश्चिम बंगाल भेजे जाते हैं जो  झारखंड, ओडिशा और बिहार से होकर गुजरते हैं। दक्षिण भारत में कर्नाटक,  तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र से जानवरों को केरल भेजा जाता है।

ज्यादातर राज्यों में जानवरों के वध या ट्रांसपोर्ट करने के लिए पशुपालन और  राजस्व विभाग से इजाजत लेनी होती है हालांकि किसी भी राज्य में इन नियमों का  पालन नहीं होता।
पुलिस चौकियों में पैसे देकर यानि ‘हफ्ता’ देकर जानवरों की तस्करी का ये कारोबर  बरसों से चलता आ रहा है। जाने-अनजाने ये सभी लोग जानवरों की तस्करी का  हिस्सा बने हुए हैं और ये बीमारी पूरे देश को लगी हुई है।
कुलमिलाकर ये कहा जाए कि जानवरों की तस्करी का ये बहुत बड़ा रैकेट है, जो हर  राज्य में सक्रिय है तो गलत ना होगा।

देखिए सरकारी रिपोर्ट क्‍या कहती है इस रैकेट के बारे में
गृह मंत्रालय ने 2006 में ही ये पाया था कि जानवरो की तस्करी का आतंकवादी  फंडिंग से सीधा ताल्लुक है। 2008 में असम धमाकों के बाद गिरफ्तार हूजी के  आतंकवादियों ने माना था कि उन्होंने धमाकों के लिए पैसे जानवरों की तस्करी से  जुटाए थे। हर साल सिर्फ उत्तर प्रदेश में जानवरों के तस्करों के हाथों सौ से ज्यादा  पुलिसवाले मारे जाते हैं।
भारत-बांग्लादेश की सीमा पर कई बीएसएफ जवान इन तस्करों के हाथों  कत्ल हो जाते हैं। खाड़ी देशों को मांस के निर्यात में जबरदस्त मुनाफा होता है।  इसीलिए मांस माफिया इसके लिए कुछ भी करने को तैयार होता है।
दिल्ली के गाजीपुर स्थित पशु बाजार में महिलाओं के प्रवेश की अलिखित पाबंदी है।  वो कहते हैं कि मंडी का मंजर बेहद डरावना और विचलित करने वाला होता है।
बिहार के सोनपुर मेले में जहां जानवर कटते हैं, वहां सिर्फ परिचित दलालों को ही  जाने दिया जाता है। स्‍थिति इतनी भयावह है कि अगर कोई वहां कैमरा लेकर जाता  है, तो वो कैमरे के साथ वापस नहीं आ सकता। कई केस में तो उसे स्ट्रेचर पर  लादकर लाना पड़े।
पशु बेदर्दी का अंतहीन सिलसिला
वजह वही है कि कसाईखाने का मंजर बेहद खतरनाक होता है. जानवरों को छोटी  रस्सियों से बांधा जाता है, खरीदार के इंतजार में जानवर कई दिनों या कई बार  हफ्तों तक खड़े रखे जाते हैं। फिर खरीदार उन्हें गाड़ियों में ठूंसकर दूसरे नर्क ले  जाते हैं. बदसलूकी के चलते जानवरों की हालत दयनीय होती है। छोटे जानवर बेचने  के बाद अपनी मां को तलाशते दिखाई देते हैं।

पशु वध में बेदर्दी एक बड़ा मसला है। किसान के घर से कसाई खाने तक के इस  मौत का ये सफर किसी एक खरीदार के मिल जाने से नहीं खत्म होता।

जानवर कई बार बिकते हैं। कई हाथों से गुजरते हैं। हर खरीदार उनसे बदसलूकी  करता है। जानवरों को ठीक से खाना-पानी नहीं मिलता क्योंकि हर खरीदार को पता  होता है कि इसे आखिर में कत्ल ही होना है। कई बार तो जानवरों को फिटकरी  वाला पानी दिया जाता है, जिससे उनके गुर्दे फेल हो जाएं। इससे उनके शरीर में  पानी जमा हो जाता है। इससे जानवर हट्टे-कट्टे दिखते हैं। इससे उनकी अच्छी कीमत  मिलती है। उन्हें पैदल ही एक बाजार से दूसरे बाजार ले जाया जाता है।

दक्षिण भारत के राज्यों में तो जानवरों की आंखों में मिर्च ठूंस दी जाती है ताकि दर्द  से वो खड़े रहें। भले ही खड़े-खड़े थकान से उनकी मौत ही क्यों न हो जाए। मुनाफा  बढ़ाने के लिए ज्यादा से ज्यादा जानवर ट्रक में ठूंसकर ले जाए जाते हैं। वो मंजर  देखकर कई बार बेहोशी आने लगती है।

तस्करी के दौरान कई जानवर दम घुटने से मर जाते हैं। कई की हड्डियां टूट जाती  हैं, आंखें खराब हो जाती हैं, या पूंछ टूट जाती है। किसी के दूसरे अंग बेकार हो  जाते हैं।

चढ़ाने-उतारने के दौरान जानवरों को गाड़ियों में फेंक दिया जाता है, जिससे वो  जख्मी हो जाते हैं। उन्हें खींचकर गाड़ियों में भर दिया जाता है। उन जानवरों पर ये  जुल्म नहीं होता जो दुधारू होते हैं या जिनका खेती में इस्तेमाल हो सकता है।
अत: पशु बाजारों का नियमन और काटने के लिए जानवरों को सीधे किसान से  खरीदने से सबसे ज्यादा नुकसान जानवरों के तस्कर माफिया को होगा। उन ठेकेदारों  और दलालों को होगा जो तस्करी में शामिल हैं।
क्‍या होगा नए नियमों से-
नए नियमों से डेयरी के कारोबार से जुड़े लोगों की जवाबदेही भी तय होगी। उनके  कारोबार से पैदा हुए बाईप्रोडक्ट को लेकर वो जिम्मेदार बनेंगे। भारत सरकार के  इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च ने दूध न देने वाले जानवरों के बेहतर  इस्तेमाल के लिए भी कुछ नुस्खे सुझाए हैं।
राज्य सरकारों को इन नुस्खों को भी लागू करना होगा। डेयरी उद्योग को-ऑपेटिव  के जरिए संगठित तरीके से चलता है। इनके जरिए बेकार जानवरों को काटने के  लिए बेचा जा सकता है। इससे जवाबदेही तय होगी और जानवरों के साथ निर्दयता  भी कम होगी।

मवेशियों को लेकर नए नियमों का विरोध हताशा और कायरता के सिवा कुछ नहीं।
बाकी देशवासियों ने इन नियमों के जारी होने के बाद राहत की सांस ली है। दिवंगत  पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे ने इन नियमों की शक्ल में देश को सबसे बड़ी  विरासत दी है।
और इसी बात पर एक शेर दाग़ देहलवी का-
सब लोग, जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं ।

- अलकनंदा सिंह 

गुरुवार, 25 मई 2017

सहारनपुर: हर इक फ़साद ज़रूरत है अब सियासत की

शायर हसनैन आक़िब का एक शेर है -

हर इक फ़साद ज़रूरत है अब सियासत की
हर इक घोटाले के पीछे वज़ीर रहते हैं।


सहारनपुर हिंसा पर जो सवाल उठ रहे  हैं उनके जवाब अभी तो कोई नहीं देगा मगर सवाल तो उठ रहे हैं ना, कि क्‍या हिंसा सिर्फ राजनीति से प्रेरित होती है, क्‍या समाज में स्‍थापित  भाईचारा वाले मापदंड जबरदस्‍ती थोपे गए, क्‍या नई पीढ़ी को हिंसा के  बूते अपना नाम-काम-दाम कमाने का शॉर्टकट मिल गया है, क्‍या हिंसा  करने वाले गांव के गांव सोशल मीडिया को दोषी बताकर अपने  समाजों में पिछले कुछ दशकों से घुलते रहे ज़हर से निजात पा सकते  हैं, क्‍या महापुरुषों के नाम को इस तरह बदनाम नहीं किया जा रहा।

हम उत्‍तरप्रदेशवासी साक्षी हैं उस प्रवृत्‍ति के जिसके कारण महापुरुषों  के नाम पर राजनैतिक स्‍वार्थों के चलते छुट्टियों से लेकर उनकी जाति  को खोज खोजकर निकाला गया, फिर  उनके नाम पर जातिगत  ठेकेदारों और राजनेताओं द्वारा विशेष शोभायात्राऐं निकालकर अपने  बाहुबल का प्रदर्शन किया जाता रहा, यह एक परंपरा सी बन गई थी। 
नई सरकार के गठित होते ही हालांकि तमाम छुट्टियां तो खत्‍म कर दी  गईं और महापुरुषों के बारे में उनकी जयंतियों व पुण्‍यतिथियों को  कार्यालयों व स्‍कूल-कॉलेजों में मनाने का निर्णय लिया गया मगर जो  विभाजनकारी ज़हर हर तबके में घोला जा चुका, उसके आफ्टरइफेक्‍ट्स  भी तो झेलने होंगे और सहारनपुर उसी आफ्टरइफेक्‍ट का चश्‍मदीद  बना।
मेरा अपना अध्‍ययन बताता है कि ना तो बाबा साहब अंबेडकर को अपनी मूर्ति पूजा करवानी थी और ना ही महाराणा प्रताप ने ये सोचकर अपनी जंग लड़ी थी कि आने वाली पीढ़ियां उनकी प्रतिमा या उनके जन्‍मदिन पर शोभायात्रा निकालें और अपने ही गांववालों को शिकार बनाऐं, मगर ऐसा ही हो रहा है।

सहारनपुर चश्‍मदीद इस बात का भी है कि कैसे बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के नाम पर भीम आर्मी द्वारा दलितों को बौद्ध धर्म ग्रहण कराकर बरगलाया जा रहा है क्‍योंकि समस्‍या धर्म में नहीं है बल्‍कि उस मानसिकता में है जो स्‍वयं को सर्वोच्‍च दर्शाने से ग्रस्‍त है।
क्‍या धर्म परिवर्तन से ठाकुर स्‍वयं को दलितों से श्रेष्‍ठ मानना छोड़ देंगे, क्‍या बौद्ध धर्म ग्रहण करने वालों को अचानक वे शक्‍तियां मिल जाऐंगीं जो दबंग ठाकुरों की मानसिकता बदल सकें।

दरअसल हिंसा हो या धर्मपरिवर्तन, जंतर मंतर पर शक्‍ति प्रदर्शन हो  अथवा शोभायात्राओं के सहारे शक्‍ति प्रदर्शन, सब इंस्‍टेंट पॉलिटिक्‍स का हिस्‍सा हैं।

बहरहाल सहारनपुर का जातिगत संघर्ष उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की कानून व्यवस्था के लिये पहली बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है और यहां के दलित एवं ठाकुर समुदाय के नेता दावा करते हैं कि सहारनपुर के जातिगत संघर्षों में राजनीति की एक अंत:धारा है जिसने मुस्लिमों को भी अपने दायरे में समेट लिया है।

घटनाक्रम के अनुसार करीब 600 दलितों और 900 ठाकुरों की आबादी वाले गांव शब्बीरपुर से हिंसक चक्र की जो शुरुआत हुई, उसमें जहां दलितों का कहना है कि ठाकुरों ने उन्हें गांव के रविदास मंदिर परिसर में बाबासाहिब अंबेडकर की प्रतिमा स्थापित नहीं करने दी थी। वहीं बाद में राजपूत राजा महाराणा प्रताप की जयंती के उपलक्ष्य में ठाकुरों के एक जुलूस पर एक दलित समूह ने आपत्ति जतायी तो इससे हिंसा फूट पड़ी। इसमें एक व्यक्ति को अपनी जान गंवानी पड़ी और 15 लोग घायल हो गये।

हालांकि जैसे कि आसार थे कथित दलित चिंतकों ने अपनी रोटियां सेंकना शुरू कर दिया है , मायावती ने दौरा कर चुकी हैं और शेहला मसूद द्वारा दलितों को खासा ''बेचारा'' बनाकर ( हालांकि सहारनपुर के दलित ना तो गरीब हैं और ना ही बेचारे, ना ही उनकी आर्थिक स्‍थिति खराब है और ना वे भूमिहीन व ठाकुरों के बंधुआ व जीहुजूरी करने वाले ) जो लेख लिखा गया, वह यह बताने को काफी है कि आज भी सहारनपुर की हिंसा को सभी अपने अपने चश्‍मे  से देखते हुए अपना पॉलिटिकल स्‍कोप खोज रहे हैं और प्रदेश सरकार के लिए मुसीबत पैदा करने का कारण बन रहे हैं।

बहरहाल समस्‍या पर राजनीति करने वाले भला उसका समाधान कैसे निकालेंगे और महापुरुषों के  नाम पर खुदी खाइयों को ये किसी भी तरह पाटने नहीं देंगे, क्‍योंकि ये इनके लिए मुफीद हैं।

और आखिर में मंज़र भोपाली इसी सियासत पर कहते हैं-

ग़म-गुसार चेहरों पर ए'तिबार मत करना
शहर में सियासत के दोस्त भी शिकारी है।



 - अलकनंदा सिंह

बुधवार, 24 मई 2017

क़ाजी नजरुल इस्लाम- एक विद्रोही जनकवि जो अपनी उम्र के आखिरी तीन दशक तक खामोश रहा

क़ाजी नजरुल इस्लाम- एक विद्रोही जनकवि जो अपनी उम्र के आखिरी तीन दशक तक खामोश रहा
आज 24 मई को जन्‍मे काजी नजरुल इस्लाम नाम है आजादी के 1942 के दौर में सामाजिक भेदभाव और धार्मिक कट्टरता के खिलाफ सबसे मुखर एक उस विद्रोही जनकवि का, जो 42 साल की अपनी उम्र के बाद के आखिरी तीन दशक तक खामोश रहा, पिक डिसीज बीमारी ने उनकी याददाश्‍त और बोलने की क्षमता को समाप्‍त कर दिया था.

आगे क़ाजी साहब के बारे में कुछ लिखूं उससे पहले ये गीत जिसे मूल बंगला से अनुवाद अनामिका घटक ने किया है - 

आज भी रोये वन में कोयलिया
चंपा कुञ्ज में आज गुंजन करे भ्रमरा -कुहके पापिया
प्रेम-कुञ्ज भी सूखा हाय!
प्राण -प्रदीप मेरे निहारो हाय!

कहीं बुझ न जाय विरही आओ लौट कर हाय!
तुम्हारा पथ निहारूँ हे प्रिय निशिदिन
माला का फूल हुआ धूल में मलिन

जनम मेरा विफल हुआ
  ।



अब सुनिए ऐतिहासिक दृटिकोण से क़ाजी साहब के बारे में -

कभी पहले विश्‍वयुद्ध में ब्रिटिश आर्मी में रहते हुए लड़ने वाले नजरूल इस्लाम बाद में अंग्रेजी शासन, कट्टरता, सांप्रदायिकता और शोषण के खिलाफ अपनी कलम के माध्यम से लड़ने लगे. उन्होंने अपने लेखन के जरिए अंग्रेजों की बहुत आलोचना की और भारत की आजादी की लड़ाई में जोर-शोर से भाग लिया जिसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने उनकी किताबों और अखबार के लेखों पर बैन लगा दिया. ये बातें आगे चलकर उनकी जेलयात्रा का कारण भी बनीं.

नजरुल को आज भी एक विद्रोही कवि के रूप में जाना जाता है. जिसकी कविताओं में आग है और जिसने जिंदगी के हर पहलू में हो रहे अन्याय के प्रति अपनी आवाज उठाई.

हिंदी में उनकी कविता 'विद्रोही' का स्वतंत्र रूपांतर 1937 में हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक 'रामविलास शर्मा' द्वारा किया गया था. जो इस तरह है-

बोलो बीर...
बोलो उन्नत मम शिर!
शिर निहारि आमार, नत शिर! अए शिखर हिमाद्रिर
बोलो महाविश्र्वेर महाकाश फाड़ि
चन्द्र, सूर्य, ग्रह, तारा छाड़ि
भूलोग, दूयलोक, गोलोक भेदिया
खुदार आसन 'आरस' छेदिया
उठियाछि चिर-विस्मय आमि विधात्रीर!
मम ललाटे रुद्र भगवान ज्वाले राज-राजटीका दीप्त जयश्रीर!
बोलो बीर...

नजरुल की कलम को दबाने की अंग्रेजों ने लाख कोशिशें कीं. फिर भी न दबाए जा सकने वाले नजरुल ने महान साहित्य लिखने के साथ-साथ शोषित लोगों और सांप्रदायिकता के खिलाफ काम जारी रखा, भारत की गंगा-जमुनी तहजीब से प्रेरणा ली. नजरुल फारसी और हिंदू दोनों ही धर्मों से अच्छी तरह परिचित थे.

उन्होंने स्वयं एक हिंदू महिला से शादी की, जिनका नाम प्रोमिला था. उनकी रचनाओं में संस्कृत, अरबी और बांग्ला तीनों ही संस्कृतियों का प्रभाव दिखाई पड़ता है. काजी नजरुल उत्सवधर्मी भी थे. कहा जाता है कि बंगाल और बांग्लादेश में उनके लिखे इस गीत के बजे बिना ईद पूरी ही नहीं होती.

20 सालों के छोटे से रचनात्मक काल में उन्होंने कई प्रमुख रागों पर गीत रचे. जिनकी संख्या 4 हजार से ज्यादा है. 'नजरुल गीति' नाम से नजरुल के गीतों का संकलन है.

उनकी गजलों ने बांग्ला को समृद्ध तो किया ही है. अरबी/ फारसी शब्दों को लेखन में अपनाकर एक नई तरह की संस्कृति की नींव भी डाली. उन्होंने कलकत्ता में ऑल इंडिया रेडियो में काम करते हुए उन्होंने कई संगीतकारों को गढ़ा जिन्होंने आगे चलकर बहुत नाम किया.

अधिकांश महान साहित्यकारों की तरह बच्चों के लिए भी उन्होंने कई कविताएं, गीत और लोरियां लिखी हैं. उनकी लिखी ये छोटी सी बाल कविता पढ़ें, जो आज भी 'पश्चिम बंगाल' और 'बांग्लादेश' में हर बच्चे के बचपन का हिस्सा होती है

बीमारी के दौरान उन्‍हें 'नजरूल ट्रीटमेंट सोसाइटी' जिसमें श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी थे, द्वारा 1952 में रांची में इलाज के लिए लाया गया, बाद में उन्हें और उनकी पत्नी प्रोमिला को इलाज के लिए लंदन भी भेजा गया, फिर वहां से वो वियना भी गए. जहां पता चला कि नजरूल को 'पिक डिजीज' नाम की बीमारी है. जो लाइलाज होती है. फिर वे लोग वापस बांग्लादेश लौट आए.

बांग्लादेश में ही रहते हुए 29 अगस्त, 1976 को उनका देहांत हो गया. जैसा कि उन्होंने अपनी एक कविता में इच्छा जाहिर की थी, उन्हें ढाका यूनिवर्सिटी के कैंपस में एक मस्जिद के बगल में दफनाया गया.

काजी नजरूल इस्लाम भारत रूपी पौधे की एक ही शाख के दो फूल 'हिंदू' और 'मुसलमानों' को बताया करते थे. काजी नजरुल इस्लाम कवि की सह्रदयता पर जोर देते थे पर उनकी कविताएं इतनी भी आदर्शवादी नहीं थीं. दरअसल नजरूल सहअस्तित्व, सौहार्द और प्रेम के समर्थक एक भावुक कवि थे.

देखिए उनकी एक कविता देखिए-

नेताओं को चंदा चाहिए और गरीब लोग
भोजन के लिए बचाया हुआ पैसा लाकर दे देते हैं
बच्चे भूख से रोने बिलबिलाने लगते हैं.
उनकी मां कहती है: 'अरे अभागों, चुप हो जाओ!
देखते नहीं, वह स्वराज्य चला आ रहा है!'
पर भूख से व्याकुल बच्चा स्वराज्य नहीं चाहता,
उसे चाहिए पेट में डालने के लिए थोड़ा सा चावल और नमक
दिन बीतता जाता है, बेचारे बच्चे ने कुछ नहीं खाया है,
उसके सुकुमार पेट में आग जल रही है.
देखकर, आंखों में आंसू भरकर, मैं पागलों की तरह दौड़ जाता हूं,
स्वराज्य का नशा तब न जाने कहां गायब हो जाता है.

नजरुल का प्रभाव और पहुंच इतनी व्यापक थी कि नजरुल का करियर खत्म होने के बहुत बाद 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में नजरूल की कविताएं विद्रोहियों के लिए महान प्रेरणा का स्त्रोत बनीं. नजरुल इस्लाम से बांग्लादेश का मानस इतना प्रभावित था कि नजरुल को बांग्लादेश का राष्ट्रीय कवि बना दिया गया.

यहां  तक  कि ठाकुर रबींद्रनाथ टैगोर भी नजरुल की आग उगलती लेखनी से बहुत प्रभावित थे. उन्होंने खुद से लगभग 40 साल छोटे नजरुल को अपनी एक किताब समर्पित की थी.

- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 13 मई 2017

बेसन की सोंधी रोटी... के बाद की यात्रा

आज मातृदिवस पर कुछ लिखना था तो सोचा वही क्‍यों ना लिखूं जो कई सालों से मन को बींधता आया है। बाजार और सोशल मीडिया जैसे प्‍लेटफॉर्म लीक पर चलते हुए बखूबी सारे ''दिवस'' मनाते हैं मगर वे उन प्रश्‍नों के उत्‍तर तो कतई नहीं दे पाते जो हमारे लिए बेहद अहम हैं...हमारे लिए यानि बच्‍चों के साथ-साथ हम मांओं के लिए भी...

यूं तो मैं इस विषय पर तभी से लिखने की सोच रही थी जब से उत्‍तरप्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ ने पद संभाला और अपनी पार्टी के संकल्‍प पत्र का एक वायदा पूरा करते हुए एंटी-रोमियो स्‍क्‍वायड का गठन किया।  एंटी-रोमियो स्‍क्‍वायड ने एक ओर जहां स्‍कूल-कॉलेज और तिराहों-चौराहों के आसपास मंडराने वाले शोहदों को पकड़-पकड़ कर उन्‍हें उनके घर वालों के सुपुर्द किया गया तो दूसरी ओर कई केस भी दायर किए। हमेशा की तरह विपक्ष के कुछ नेताओं ने इन शोहदों पर दया दिखाई तो कुछ ने इसे स्‍वतंत्रता में बाधा डालने वाला कदम बताया मगर किसी ने ये नहीं सोचा कि आखिर ये स्‍थिति आई क्‍यों? जो काम घर वालों को करना चाहिए था, उसे शासन को क्‍यों करना पड़ा। हम भले ही इसके लिए कानून व्‍यवस्‍था को दोषी मानते रहें मगर सच यह है कि सरकारों से ज्‍यादा दोष परिवारों का रहा है।
हम चूके हैं, हमारे संस्‍कार और हमारा पारिवारिक ढांचा चूका है, साथ ही इन सबसे ज्‍यादा हमारी मांएं चूकी हैं।

बच्‍चे के भाग्‍य का निर्माता ईश्‍वर है तो सांसारिक विधिविधान सिखाने को ''मां'' हैं, मां ही सिखाती है कि किससे कैसे व्‍यवहार किया जाए। इसीलिए मां को ईश्‍वर के बच्‍चे के नौतिक-अनैतिक कार्य की जिम्‍मेदारी मां की होती है। जब लायक बच्‍चे का श्रेय सब मां को देते हैं तो उसकी नालायकी का जिम्‍मा भी उसे अपने ही सिर लेना होगा।
हमारे ब्रज में कहावत भी है ना कि ''चोर नाय चोर की मैया ऐ मारौ''। मांएं अपनी परवरिश व जिम्‍मेदारी का बोझ सोशल मीडिया या अन्‍य इलेक्‍ट्रॉनिक संसाधनों पर नहीं डाल सकतीं क्‍योंकि बच्‍चे तो साधनहीन परिवारों के भी बिगड़ते हैं। तो चूक कहां है, जीवन की निर्मात्री से चूक तो हुई है और अभी भी होती जा रही है। कानून व्‍यवस्‍था, पारिवारिक विसंगतियों जैसे बहानों से कब तक मांएं अपने आपको कंफर्ट जोन में रखती रहेंगी।

कुछ दिन पहले निर्भया गैंगरेप का फैसला आया, चारों अपराधियों को फांसी की सजा सुनाई गई। एक दर्दनाक हादसे की मुकम्‍मल तस्‍वीर, और इसके दोनों पहलू हमारे सामने। सजा दिलाने वाले और पाने वाले अपने-अपने तरीके से फैसले की व्‍याख्‍या कर रहे थे। तस्‍वीर के एक पहलू में निर्भया की मां कह रही थी कि कोर्ट ने इंसाफ किया और मीडिया ने उस इंसाफ की लड़ाई में उसका भरपूर साथ भी दिया। वहीं फांसी की सजा पाए चारों बलात्‍कारियों की मांएं कह रही थीं कि हमारे साथ अन्‍याय हुआ है। दोनों ओर मांएं अपनी अपनी संतानों के लिए दुखी व संतप्‍त होती रहीं मगर अपराध करने वालों ने ये एक बार भी सोचा कि वो जो कर रहे हैं यदि उनकी अपनी मां उस जगह हो तो...? नहीं, उन्‍होंने नहीं सोचा तभी तो ऐसे जघन्‍य अपराध को अंजाम दिया जिसने देश से लेकर विदेश तक हाहाकार मचा दिया।

उनका कृत्‍य देखकर ही कानून को अपना काम करना पड़ा, यदि मांओं ने अपना काम किया होता और इन अभागों की परवरिश सही तरीके से की होती तो ऐसी नौबत आने का सवाल ही कहां था। इसी प्रकार जब किन्‍हीं शोहदों को एंटी-रोमिओ स्‍क्‍वायड पकड़ती है उंगलियां उनके घर वालों और खासकर मां की ओर भी उठती हैं। इसलिए मानना तो पड़ेगा कि चूक कहीं न कहीं जीवन की निर्मात्री से भी होती है।

हर साल 14 मई को मातृ दिवस मनाने वाले हम, अपनी मांओं के प्रति कृतज्ञता प्रगट करते हैं, करनी भी चाहिए मगर इस कृतज्ञ भाव में वे कर्तव्‍य नहीं भुलाए जाने चाहिए जो समाज को ''और अच्‍छा व निष्‍कंटक'' बना सकें। जिनसे हमारे बच्‍चे निर्भय होकर सड़कों व गली-चौराहों पर घूम सकें।

मैं भी मां हूं और अपनी मां के कर्तव्‍यों के कारण, उनकी मेहनत के कारण आज मैं अपने शब्दों को अपने विचारों का माध्‍यम बना पा रही हूं, जब अपना बचपन अपनी शिक्षा का दौर याद करती हूं तो कई बार ऐसा लगता है कि ये कृतज्ञता शब्‍द बहुत नाकाफी है मेरी मां के लिए। मगर हमें सिर्फ अपनी-अपनी मां के प्रति कृतज्ञ होने के साथ ही अपने प्रति भी कोई संकल्‍प लेना होगा ताकि भविष्‍य में किसी निर्भया को इतनी भयंकर मौत ना मरना पड़े और ना किसी के बेटे फांसी पर झूलें। इसके लिए बहानों को दफन करना होगा। आधुनिकता, संस्‍कार, शिक्षा और मातृप्रेम में सामंजस्‍य बैठाना होगा।

चलिए मातृ दिवस पर आप भी पढ़िए निदा फाज़ली की एक बेहद खूबसूरत रचना क्‍योंकि मां का स्‍वरूप आज भले ही बदल रहा हो मगर हमारे जीवन में उनकी मौजूदगी ऐसी ही है जैसी कि निदा साहब ने बताई है-


बेसन की सोंधी रोटी

बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चौका बासन
चिमटा फुँकनी जैसी माँ

बान की खूर्रीं खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी
थकी दुपहरी जैसी माँ

चिड़ियों की चहकार में गूँजे
राधा-मोहन अली-अली
मुर्गे की आवाज़ से खुलती
घर की कुंडी जैसी माँ

बीवी बेटी बहन पड़ोसन
थोड़ी थोड़ी सी सब में
दिनभर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ

बाँट के अपना चेहरा माथा
आँखें जाने कहाँ गईं
फटे पुराने इक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ


- अलकनंदा सिंह