मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

इस दीपावली बाहर का प्रकाश भीतर भी जाना चाहिए

दीपावली के महापर्व पर आज लिखने को बहुत कुछ है मगर मैं शब्‍दों से खाली हूं और इसीलिए पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के आलोक पर्व का सहारा लिया।

आलोक पर्व में ज्योतिर्मयी देवी लक्ष्मी पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं कि लोग कहे-सुने जाते हैं कि अंधकार महाबलवान है। उससे जूझने का संकल्‍प मूढ़ दर्शन मात्र है, तो क्‍या यह संकल्‍प शक्‍ति का पराभव है। मनुष्‍यता की अवमानना है। दीवाली कहती है कि अंधकार से जूझने का संकल्‍प ही यथार्थ है। अंधकार की सैकड़ों परतें हैं। उससे जूझना ही मनुष्‍यत्‍व है। जूझने का संकल्‍प ही महादेवता है। उसी को प्रत्‍यक्ष करने की क्रिया को लक्ष्‍मी पूजा कहते हैं।

आज से दीपोत्‍सव का पंचदिवसीय पर्व आरंभ हो चुका है। घरों पर लटकती रंगबिरंगी झालरें, टेराकोटा दीपकों की नई-नई लुभावनी डिजाइन्‍स और रंगोली की वृहद परिकल्‍पनाएं हमारी कलाओं को उभारती हुई इन पांच दिनों तक साकार रूप में हमारे सामने होंगी। इन कलाओं में हम अपनी सोच को सजायेंगे। दीपावली से जुड़ी कथाविस्‍तारों से अलग हम दीपावली के ध्‍येय की ओर शायद ही ध्‍यान दे पायें कि आखिर इसे प्रकाश से भरपूर उल्‍लास के संग मनाने की परंपरा क्‍योंकर स्‍थापित की गई होगी।

हमारा हर पर्व मन से मन की यात्रा के उद्देश्‍य के साथ मनाया जाता था मगर आपाधापी में ऊपरी सजावट का बोझ बढ़ाते गए और हम पर्वों का मुख्‍य उद्देश्‍य तिरोहित करते गए। यह भूलते गए कि दीपावली मन के अंधेरों को हटाकर रोशनी की ओर प्रस्‍थान का नाम है।

आजकल विचारकों की भीड़ लगी हुई है जो विचारों, इच्‍छाओं, राजनैतिक विश्‍लेषणों, धार्मिक-सामाजिक उन्‍मादों से लबालब चल रहे हमारे देश में हर विषय पर अपनी राय रख रहे हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि साक्षात् वेद हमारे समक्ष अपना ज्ञान उड़ेले जा रहे हैं और हम मूढ़मति-अज्ञानी करबद्ध उनका मुंह ताक रहे हैं। इन्‍हीं ”ज्ञान के भंडारों” ने अपने उपदेशों में सदैव त्‍याग की बात तो की, मगर भोग को नकारते रहे।
ऐसा कैसे हो सकता है कि आप सिर्फ मीठा ही खाते रहें। बिना तीखे के मीठा भी बेस्‍वाद होगा। अगर यही होता तो ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ की बात ही नहीं होती अर्थात् भोग भी त्याग के साथ होना चाहिए। लगातार एक संतुलन की बात है यह। दीपावली के आरंभ दिवस ‘धनतेरस’ का भी तो यही संदेश है कि एक दीया लक्ष्‍मी जी का, दूसरा धन्‍वातरि का, और तीसरा यम के लिए। धन, स्‍वास्‍थ्‍य जीवन के लिए आवयश्‍क है तो मृत्‍यु से अभय रखने को यम से प्रार्थना भी आवश्‍यक है। और यह संदेश पूरे पांच दिन तक अलग-अलग तरीकों से जन मानस में फैलाने की व्‍यवस्‍था का नाम है दीपावली क्‍योंकि संतुलन के साथ प्रकाश का महत्‍व और बढ़ जाता है।

अब इस दीपावली पर मन से मन की यात्रा करके तो देखें, हमारी सारी जीवन-ऊर्जा बाहर की तरफ यात्रा कर रही है और हम भीतर अंधेरे में पड़े हैं, यह ऊर्जा भीतर की तरफ लौटे तो यही ऊर्जा प्रकाश बनेगी, यह ऊर्जा ही प्रकाश है।

घरों को सजाकर इसका उद्देश्‍य पूरा नहीं होगा। इस दीपावली पर बस इतना करना होगा कि हमारा जो सारा प्रकाश बाहर पड़ रहा है- पेड़-पौधों-लोगों पर उसे अपने भीतर ही ठहराना होगा ताकि हम सबको देखने से पहले स्‍वयं को देखें और अपने प्रति अंधे न बनें क्‍योंकि सबको देखने से क्या होगा? जिसने अपने को न देखा, उसने कुछ भी न देखा।

हमें मनुष्‍यता की अवमानना नहीं करनी है क्‍योंकि सैकड़ों परतों वाले अंधकार से जूझने का संकल्‍प यथार्थ में बदलना है। हमारा जूझारूपन ही हमारे संकल्‍प का देवता है जिसे साधकर वास्‍तविक लक्ष्‍मी पूजा करनी होगी। तभी होगी शुभ दीपावली।

- Alaknanda singh

गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

शोषण की नई भाषा गढ़ता 'फंसाने' का चलन और बच्‍चियां

Photo Courtsy: Google
कल अंतर्राष्‍ट्रीय बालिका दिवस पर बेटियों के लिए बहुत कुछ सुना,  देखा और पढ़ा भी। सभी कुछ बेहद भावनात्‍मक था। कल इसी बालिका  दिवस पर बच्‍चियों को सुप्रीम कोर्ट ने भी बड़ी सौगात दे दी।

सुप्रीम कोर्ट ने बालविवाह जैसी कुरीतियों पर प्रहार करते हुए ऐतिहासिक  निर्णय दिया कि अब नाबालिग पत्‍नी से संबंध बनाने को 'रेप' माना  जाएगा और इसमें पॉक्‍सो एक्‍ट के तहत कार्यवाही होगी।
आदेश का सबसे महत्‍वपूर्ण पहलू यह है कि उक्‍त निर्णय देश के सभी  धर्मों, संप्रदायों और वर्गों पर समान रूप से लागू होगा। कोर्ट ने इसके  साथ ही रेप के प्रावधान आईपीसी की धारा 375 के 'अपवाद'-2 में जो  उम्र का उल्‍लेख '15 से कम नहीं' दिया गया है, को हटाकर '18 से कम  नहीं' कर दिया। इस 'अपवाद-2' में 15 वर्ष की उम्र वाली लड़की के साथ  विवाह के उपरांत यौन संबंध बनाने को 'रेप नहीं' माना गया था।

ज़ाहिर है ये 'अपवाद-2' ही उन लोगों के लिए हथियार था जो बालविवाह  को संपन्‍न कराते थे। बाल विवाह निवारण कानून की धारा 13 से प्राप्‍त  आंकड़े बताते हैं कि हर अक्षय तृतीया पर हमारे देश में हजारों बाल  विवाह होते हैं, जिसके बाद कम उम्र की दुल्‍हनें यानि बच्‍चियों को  यौनदासी बनने पर विवश किया जाता है।
हम सभी जानते हैं कि दंड के बिना कोई भी कुरीति से जूझना आसान  नहीं होता है क्‍योंकि यह समाज में घुन की तरह समाई हुई है।  ऐसे में  यह ऐतिहासिक फैसला इससे निपटने के लिए बड़ा हथियार साबित  होगा। बच्‍चियों के हक में इसके दूरगामी परिणाम भी अच्‍छे होंगे। हम  जानते हैं कि पति-पत्‍नी के बीच 'बराबरी के अलावा जीवन व व्‍यक्‍तिगत  आजादी का अधिकार' देने वाले कानून भी हैं मगर विवाहित नाबालिगों  के साथ ज्‍यादती भी तो कम नहीं हैं।

बच्‍चियों के शारीरिक व मानसिक विकास की धज्‍जियां उड़ाई जाती रही  हैं, और यह सिर्फ इसलिए होता रहा क्‍योंकि सरकारें विवाहोपरांत संबंध  को परिभाषित करते हुए रेप की धारा में 'अपवाद-2' को जोड़कर  बालविवाह बंद करने का फौरी ढकोसला करती रहीं और बच्‍चियां इनकी  भेंट चढ़ती रहीं। इतना ही नहीं, यौन संबंध बनाने को सहमति की उम्र  भी 15 से बढ़ाकर 18 तब की गई, जब निर्भया केस हुआ।   

इंडिपेंडेंट थॉट नामक संगठन की याचिका पर दिए गए इस ऐतिहासिक   फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह व्‍यवस्‍था दी है कि 18 वर्ष से कम उम्र की  पत्‍नी के साथ सेक्‍स 'रेप' ही होगा और लड़की की शिकायत पर पुलिस  रेप का केस दर्ज कर सकती है।

कोर्ट के आदेश की आखिरी लाइन ''लड़की की शिकायत मिलने पर  पुलिस रेप का केस दर्ज कर सकती है'' बस यही आखिरी लाइन कोर्ट के  फैसले की इस नई व्‍यवस्‍था के दुरुपयोग की पूरी-पूरी संभावना पैदा  करती है। मेरी आशंका उस आपराधिक मानसिकता को लेकर है जो हर  कानून को मानने से पहले उसके दुरुपयोग के बारे में पहले ही अपने  आंकड़े बैठा लेती है।

दहेजविरोधी कानून, बलात्‍कार विरोधी कानून, पॉक्‍सो, यौन शोषण की  धाराएं किस कदर मजाक का विषय बन गए हैं, इसके उदाहरण हर रोज  बढ़ते जा रहे हैं। अनेक निरपराध परिवार जेल में सिर्फ इन कानूनों के  दुरुपयोग की सजा भुगत रहे हैं। अब महिला-पुरुष के बीच स्‍वाभाविक  संबंध भी आशंकाओं से घिरते जा रहे हैं। इन सभी कानूनों को अब  महिलाऐं भी ब्‍लैकमेलिंग के लिए खूब प्रयोग करने लगी हैं।

कार्यस्‍थल पर महिला कर्मचारी हों या घरों में काम करने वाली मेड, मन  मुताबिक शादी न होने पर 'बहू' द्वारा दहेज मांगने का आरोप लगाने का  चलन हो या अपनी बच्‍ची या बच्‍चे को आगे कर पॉक्‍सो के तहत  'फंसाने' का चलन। इन सबका दुरुपयोग जमकर हो रहा है मगर इन  सामाजिक-उच्‍छृंखलताओं और बदले की भावनाओं का तोड़ तो तब तक  नहीं हो सकता जब तक कि समाज के भीतर से आवाज न उठे।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इतना तो अवश्‍य होगा कि समाज  की बेहतरी और 'सच में पीड़ित' बच्‍चियों के लिए लड़ने वालों को हौसला  मिल जाएगा।

इन्‍हीं विषयों पर मैं कुछ इस तरह सोचती हूं कि-

रोज नए प्रतिमान गढ़े
रोज नया सूरज देखा
पर अब भी राहु की छाया का
भय अंतस मन से नहीं गया,
लिंगभेद का ये दानव,
अपने संग लेकर आया है-
कुछ नए राहुओं की छाया,
कुछ नई जमातें शोषण की,
कि सीख रही हैं स्‍त्रियां भी-
अब नई भाषाएं शोषण की।

-अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

बतर्ज़ अताउल मुस्‍तफा...हाईकोर्ट ने दिखाया आईना

क्‍यों उनकी राष्‍ट्रभक्‍ति वीडियोग्राफी की मोहताज है

यदि खुशहाल जीवन जीने के लिए प्रेम, कर्तव्‍य और मौलिक  अधिकारों में से किसी एक का चुनाव करने को कहा जाए तो आप  किसे चुनेंगे।
जहां तक मेरा ख्‍याल है, जीवन को सही और संतोषपूर्वक जीने के  लिए इन सभी की आवश्‍यकता होती है परंतु जब आप ये सोच लेते  हैं कि ''जो आप सोच रहे हैं वह ही आखिरी सत्‍य है'' तो फिर  किसी अन्‍य का समझाना भी कोई मायने नहीं रखता।

राष्‍ट्र के प्रति प्रेम, कर्तव्‍य और राष्‍ट्र को 'राष्‍ट्र' बनाए रखने के  लिए प्राप्‍त मौलिक अधिकारों के नाम पर आजकल जो 'खेल' होने  लगा है और राष्‍ट्र की एकता के लिए जायज हर बात को  राजनैतिक चश्‍मे से देखा जाने लगा है, उसके मद्देनजर यह जरूरी  हो गया है कि राष्‍ट्र के प्रति जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।

कल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्‍वपूर्ण फैसले में कहा है कि  संविधान का सहारा सिर्फ अधिकारों का ढिंढोरा पीटने के लिए नहीं  लिया जाना चाहिए, कर्तव्‍यों को भी समझना चाहिए। राष्‍ट्रगान और  राष्ट्रध्‍वज का सम्‍मान करना प्रत्‍येक नागरिक का कर्तव्‍य है,  इसलिए राष्‍ट्रगान गाना और राष्‍ट्रध्‍वज फहराना, सभी शिक्षण  संस्‍थाओं व अन्‍य संस्‍थानों के लिए अनिवार्य है।

यह बातें चीफ जस्‍टिस डी. बी. भोंसले व जस्‍टिस यशवंत वर्मा की  खंडपीठ ने मऊ के अताउल मुस्‍तफा की उस याचिका को खारिज  करते हुए कहीं जिसमें प्रदेश सरकार के 3 अगस्‍त 2017 व 6  सितंबर 2017 के उस शासनादेश को चुनौती दी गई थी जिसमें  प्रदेशभर के मदरसों में अनिवार्य रूप से राष्‍ट्रगान करने की बात  लिखी थी। अताउल मुस्‍तफा ने इस साशनादेश को रद्द करने की  मांग की थी और इसे ''देशभक्‍ति थोपना'' बताया था। मुस्‍तफा ने  तो याचिका में यहां तक कह दिया कि यदि इसे अनिवार्य किया  जाता है तो यह उनकी धार्मिक आस्‍था और विश्‍वास के विरुद्ध है। 

याचिकाकर्ता अताउल मुस्‍तफा और इसकी जैसी सोच रखने वालों ने  क्‍या कभी ये भी सोचा है कि आखिर प्रदेश सरकार को मदरसों के  लिए ही ऐसा आदेश देने की जरूरत क्‍यों पड़ी, और इससे भी  ज्‍यादा शर्म की बात ये कि राष्‍ट्रगान व राष्‍ट्रध्‍वज के लिए 'सर्कुलर'  जारी करना पड़ा। जो कार्य स्‍वभावत: किये जाने चाहिए उसके लिए  सरकार को 'कहना' क्‍यों पड़ा? 

समझ में नहीं आता कि भाजपा सरकारों के हर कदम को  कट्टरवादी लोग मुस्‍लिम' विरोधी ही क्‍यों समझते हैं, क्‍या एक  राष्‍ट्र-एकभावना से काम नहीं किया जा सकता। क्‍या मुस्‍लिम इस  देश में मेहमान हैं। मीडिया में भी इन्‍हें ही 'संप्रदाय विशेष' क्‍यों कहा जाता  है। क्‍यों अधिकांश मुस्‍लिम, संविधान प्रदत्त अधिकारों की बात तो  करते हैं किंतु राष्‍ट्र के प्रति अपने कर्तव्‍य को नहीं समझते।  अल्‍पसंख्‍यकों में एक मुस्‍लिम वर्ग ही ऐसा है जो राजनीति से  लेकर नीतिगत फैसलों तक तथा राष्‍ट्र की सुरक्षा से लेकर शांति  कायम रखने के प्रयासों तक में टांग अड़ाता है और स्‍वयं को  दबा-कुचला तथा ''बेचारा'' साबित करने में लगा रहता है।

जब से केंद्र में नरेंद्र मोदी की और उसके बाद उत्‍तर प्रदेश में योगी  आदित्‍यनाथ की सरकार बनी है तभी से अचानक लोगों को मौलिक  अधिकार, धार्मिक अधिकार, ''खाने-पीने'' का अधिकार, देश की  अस्‍मिता को गरियाने का अधिकार, धार्मिक भावना के नाम पर  अराजकता का अधिकार याद आने लगा है। अचानक उन्‍हें लगा कि  ''अरे, ये भी तो मुद्दे हैं जिन पर सरकार को घेरा जा सकता है,  और सीधे सरकार न घिर सके तो कोर्ट के ज़रिए उसे और उसके  निर्णयों को चुनौती दी जा सकती है''। कर्तव्‍यों को ताक पर रखकर  अधिकारों की इस मुहिम को चलाने वाले इन तत्‍वों को संभवत: ये  पता नहीं था कि उनकी हर बात बूमरैंग की भांति उन पर ही भारी  पड़ने वाली है।

हाईकोर्ट ने मुस्‍तफा की याचिका खारिज करते हुए प्रदेश के  मुख्‍यसचिव को इस आशय का निर्देश भी दिया है कि सभी  मदरसों-शिक्षण संस्‍थाओं में राष्‍ट्रगान और राष्‍ट्रध्‍वज संबंधी दिए  गए राज्‍य सरकार के आदेश-निर्देशों का पालन करायें।

कितने कमाल की बात है कि राष्ट्रगान गाने के विरुद्ध कोर्ट में  याचिका लगायी जाती है और बात बात पर कैंडल मार्च निकालने वाले सभी बुद्धिजीवी खामोश रहते हैं।

पहले राष्‍ट्रगीत वन्दे मातरम्, अब राष्ट्रगान और फिर तिरंगा  फहराने पर आपत्‍ति, आखिर कट्टरवादियों की ये मुहिम कहां जाकर  ठहरेगी अथवा ये हर मुद्दे पर कोर्ट के आदेश-निर्देशों को ही मानने  के लिए बाध्‍य होंगे।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत यह अधिकारों का मजाक उड़ाना तो है  ही, साथ ही लाखों मुकद्दमों की सुनवाई के बोझ से दबी  न्‍यायपालिका के समय का दुरुपयोग करना भी है।
बहरहाल यह सोच ही शर्मनाक और आत्‍मघाती है लिहाजा इस पर  पाबंदी लगानी चाहिए वरना आज तक प्रचलित यह ''जुमला'' कि  हर मुसलमान बेशक आतंकवादी नहीं होता किंतु हर आतंकवादी,  मुसलमान ही क्‍यों होता है, आगे चलकर कड़वा सच न बन जाए।  राष्‍ट्र के प्रति सम्‍मान का भाव न रखने की ऐसी सोच ही कहीं  मुसलमानों को ऐसे रास्‍ते पर तो नहीं ले जा रही जहां उसका  खामियाजा पूरी कौम को भुगतना पड़ जाए और उनकी राष्‍ट्रभक्‍ति  पर हमेशा के लिए सवालिया निशान लग जाए। म्‍यांमार के  रोहिंग्‍या मुसलमानों का दर-दर भटकना इस स्‍थिति के आंकलन  करने का मौका दे रहा है,बशर्ते कट्टरवादी इसे समझने को तैयार  हों। म्‍यांमार उन्‍हें नागरिकता देने को तैयार नहीं है और बांग्‍लादेश  तथा चीन जैसे मुल्‍क उन्‍हें शरण देने से परहेज कर रहे हैं। और  तो और इस्‍लाम के नाम पर भारत से अलग हुआ पाकिस्‍तान भी  उनसे कोई सहानुभूति नहीं रखता।   
बेहतर हो कि मुस्‍लिम खुद को राष्‍ट्र के जिम्‍मेदार नागरिक की तरह पेश करें और कठमुल्‍लों  एवं वोट के सौदागरों का मोहरा बनने की बजाय विचार करें कि  उनके क्रिया-कलाप शक के दायरे में क्‍यों आते जा रहे हैं।  जिस  दिन वह इस दिशा में विचार करने लगेंगे, उस दिन उन्‍हें यह भी  समझ में आ जाएगा कि किसी सरकार को क्‍यों मदरसों के अंदर  राष्‍ट्रगान के लिए आदेश देना पड़ता है और क्‍यों उनकी राष्‍ट्रभक्‍ति  वीडियोग्राफी की मोहताज है। 
- अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

संस्‍कारों की खोज CCTV से

आज नवरात्रि की अष्‍टमी तिथि है, शक्‍ति के आगमन का ये त्‍यौहार कुछ घंटों में समापन  की ओर बढ़ चलेगा परंतु इन नवदुर्गाओं में बहुत कुछ ऐसा घट चुका है जो हमें अपने  छीजते मूल्‍यों की ओर मुड़कर देखने को विवश करता है कि आखिर चूक कहां हुई है। साथ  ही यह भी कि जहां चूक हुई वहां से अब आगे क्‍या-क्‍या और कैसे-कैसे सुधारा जा सकता  है।

शक्‍ति के आठ रूपों को मूर्तिरूप में पूजकर, नारियल और चुनरी ओढ़ाने के बाद भी यदि  अपने भीतर बैठे कलुष को हम तिरोहित नहीं कर पाते, तो शक्‍ति की आराधना एक रस्‍म  से ज्‍यादा और कुछ नहीं। और ये रस्‍म ही है जो तब भी निबाही गई थी जब निर्भया कांड  हुआ और ये रस्‍म पिछले हफ्ते भी निबाही गई जब बीएचयू की छात्राओं ने बाकायदा  अश्‍लील हरकतों की शिकायत यूनीवर्सिटी के वीसी से की।

मैं यहां वो शिकायती-पत्र दिखा रही हूं जो छात्राओं ने दिया।
शिकायती-पत्र जो छात्राओं ने दिया

हालांकि प्रदेश सरकार और  वीसी को इसमें भी राजनीति दिख रही थी। फिलहाल घटनाक्रम बता रहे हैं कि मुख्‍यमंत्री  योगी ने आश्‍वासन दिया है कि छात्रों पर लगे केस वापस लिए जाऐंगे, यूनीवर्सिटी में  प्रशासनिक उठापटक जारी है, वीसी हटा दिए गए हैं, चीफ प्रॉक्‍टर बदल दिए गए, कल से  सीआरपीएफ भी हटा ली गई, एबीवीपी का धरना खत्‍म हो गया, छात्र-छात्राओं का  आवागमन शुरू हो गया।

सब कुछ ढर्रे पर वापस मगर इतना सब होने के बाद हमें भी सोचना होगा कि आखिर  सरेआम छेड़खानी की ये घटनाऐं जो एक पूरे के पूरे विश्‍वविद्यालय की आन बान शान के  लिए खतरा बन गईं, यकायक तो नहीं उपजी होंगी ना। बात वहीं फिर हमारी उस चूक पर  ही आ जाती है, जो संस्‍कारों से जुड़ी है।
 
महिलाओं के खिलाफ छेड़खानी पहले भी होती थी मगर पिछले दो-ढाई दशकों में इसने  महामारी का रूप ले लिया है और अब तो इस महामारी ने वीभत्‍स रुख अख्‍तियार कर  लिया है। इतना वीभत्‍स कि ये बच्‍चियों के साथ साथ बच्‍चों और किशोरों को भी अपनी  गिरफ्त में ले रही है। धर्मविशेष- जाति विशेष- वर्गविशेष- लिंगविशेष के खांचे में भले ही  हम इसे बांट दें मगर ये है खालिस संस्‍कार का संकट ही। और ये संकट समाज में  संक्रामक हो चुका है, अब लड़का भी अगर लड़के से हंसकर बात करता है तो शक होने लगता है। अविश्‍वास का ये माहौल कभी कभी बेहद असहनीय और टूटन भरा होता है।

निश्‍चित ही आज भी हम ये निर्णय नहीं कर पा रहे हैं कि बुरी तरह छीजते अपने मूल्‍यों  को संभालें या आधुनिकता के तमगे को। इसी आधुनिकता के नाम पर अगर  ''संस्‍कारविहीन'' होना एक फैशन की तरह न बनाया गया होता, आज हमें अपने संस्‍कारों  की खोज सीसीटीवी के बहाने न करनी पड़ती।

यक्षप्रश्‍न अब भी वहीं मौजूद है कि सीसीटीवी आखिर कहां कहां लगाई जाए और इसके  होने का भय कितनी रक्षा कर पाएगा। स्‍कूल, कॉलेज, सार्वजनिक स्‍थानों के साथ साथ क्‍या  ये घरों में भी शोषण को रोक पाएगा। वह भी तब जबकि हमारे धर्माचार्य भी इसमें लिप्‍त  हों, घर के बड़े लिप्‍त हों।

आज रेयान इंटरनेशनल हो या बीएचयू की छेड़खानी का मामला, चंद रोज पहले गैंगरेप की  पीड़िता द्वारा यू-टर्न लेकर पुलिस में दर्ज रिपोर्ट को ''गुस्‍से में किया जाना'' बताना हो या  बाबाओं (साधु-संत नहीं) के एक वर्ग का बलात्‍कारी साबित होते जाना हो, ये सब उदाहरण  हमारे अधकचरे ज्ञान, अधकचरी सभ्‍यता, अधकचरी आधुनिकता के फलितार्थ ही तो हैं।

उदाहरण तो बहुत हैं इन मूल्‍यों और संस्‍कारों की धज्‍जियां उड़ाए जाने के मगर सभी को  एक कॉलम में लिखना संभव भी कहां, परंतु इतना अवश्‍य है कि इस माहौल को लेकर जो  घबराहट मैं महसूस कर रही हूं, निश्‍चित ही आप भी करते होंगे।

उक्‍त घटनाओं के बाद सीसीटीवी को बतौर सुबूत पेश किया जा रहा है मगर यह सीसीटीवी  वाला सुबूत संस्‍कारों के छीजन के पीछे की मानसिकता , अपराध करने वाले की  पारिवारिक पृष्‍ठभूमि और ''अपराध का आदतन'' होने की वजह नहीं बता सकता। सीसीटीवी  सुबूत हो सकते हैं मगर इनमें वो ताकत नहीं जो मां-बहन की गालियों से शुरू हुआ  संस्‍कारों के मौजूदा क्षरण को रोक सकें, ये भावनायें नहीं बता सकते, विनम्रता और दूसरों  की इज्‍जत करना नहीं सिखा सकते, वह तो ''घर'' ही सिखा सकता है।

छेड़खानी की हर घटना पर राजनीति के बुलबुले हमारी नजरों से समस्‍या को ओझल करने  का प्रयत्‍न करते हैं तभी तो बीएचयू का सिंहद्वार हो या जेएनयू का हॉस्‍टल, रेयॉन  इंटरनेशनल हो या गाजियाबाद की नन्‍हीं बच्‍ची का मामला सभी में नेतागिरी हुई, सरकारों  के विरोध में बवाल हुआ मगर इन राजनैतिक बुलबुलों में भी घरों से जो संस्‍कार ओझल  हुए हैं,उस ओर कोई बात नहीं कर रहा। ज़ाहिर है कि नौदेवी अब भी हमारी उस अंतरात्‍मा  को नहीं जगा पाई है जो शक्‍तिपूजा के नाम पर घंट-घड़ियाल लेकर हर घर पर दस्‍तक  देती है कि जागो अब भी वक्‍त है...बहुत कुछ सुधारा जा सकता है।
 
-अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

हे देवि! अब मृजया रक्ष्यते को लेकर हमारी शर्मिंदगी भी स्‍वीकार करें

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अतिवाद कोई भी हो, वह सदैव संबंधित विषय की उत्‍सुकता को नष्‍ट कर देता है। अति  की घृणा, प्रमाद, सुंदरता, वैमनस्‍य, भोजन, भूख, जिस तरह जीवन को प्रभावित करती  हैं और स्‍वाभाविक प्रेम, त्‍याग, कर्तव्‍य को खा जाती हैं उसी प्रकार आजकल ''अति  धार्मिकता'' अपने कुछ ऐसे ही दुष्‍प्रभावों को हमारे सामने ला रही है। जो धर्म से जुड़ी  उत्‍सवधर्मिता कभी हमारी खासियत हुआ करती थी और अपने ही रंग में देश के हर  वर्ग को तथा हर क्षेत्र को रंगकर उत्‍साह भरती थी, आज वही अतिवाद की शिकार हो  गई है।

इसी ''अति धार्मिकता'' ने जहां धर्म को तमाम फर्जी बाबाओं के हवाले किया,  वहीं सोशल मीडिया और बाजारों में लाकर 'धर्म के उपभोक्‍तावाद' का प्रचार किया।

इस सारी जद्दोजहद के बीच इन उत्‍सवों को मनाने का जो मुख्‍य मकसद था, वह  तिरोहित हो गया। कभी जीवन पद्धति में तन-मन की स्‍वच्‍छता को निर्धारित करने  वाला हमारा धर्म ही बाजार और फाइवस्‍टार सुविधाओं वाले आश्रमों के जरिए समाज की  कमजोरी बन गया।

जिन धार्मिक उत्‍सवों को मनाने का सर्वोपरि उद्देश्‍य स्‍वच्‍छता हुआ करता था, उसके  लिए आज देशभर में प्रधानमंत्री को चीख-चीखकर कहना पड़ रहा है कि स्‍वच्‍छता को  संकल्‍प बनाएं। ये हमारे लिए बेहद शर्म की बात है कि आज स्‍वच्‍छता सिखानी पड़ रही  है, कचरे के ढेरों पर बैठकर हम देवी-देवताओं की (बाजार के अनुसार) आराधना तो कर  रहे हैं परंतु स्‍वच्‍छता का संकल्‍प नहीं लेते।

इस ओढ़ी हुई ''अति धार्मिकता'' के कारण ही हर त्‍यौहार को मनाने की बाध्‍यता ने तन  और मन दोनों की स्‍वच्‍छता पीछे डाल दी तथा धार्मिक उपदेशों-प्रवचनों-परंपराओं-रूढ़ियों  के मुलम्‍मे आज के इन धार्मिक आयोजनों की हकीकत बन गए।
 
हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी कल से एक बार फिर शारदीय नवरात्र की स्थापना हो  चुकी है। बाजारवाद के कारण ही सभी को धन, धान्य, सुख, समृद्धि और संतुष्टि से  परिपूर्ण जीवन की कामनाओं वाले स्‍लोगन से सजे संदेश इनबॉक्‍स को भरने लगे हैं।  कब श्रावण माह की गहमागहमी के बाद श्रीकृण जन्‍माष्‍टमी के बाद गणपति की  स्‍थापना-विसर्जन, श्राद्ध पक्ष और अब नवरात्रि का विजयदशमी तक चलने वाला दस  दिवसीय उत्‍सव आ गया, पता ही नहीं चला। मगर इस बीच जो सबसे ज्‍यादा प्रभावित  रही, वह है स्‍वच्‍छता जबकि उपर्युक्‍त सभी उत्‍सवों में स्‍वच्‍छता प्रधान है।

कोई भी पूजा मन, वचन और कर्म की शुद्धि व स्‍वच्‍छता के बिना पूरी नहीं होती,  शारदीय नवरात्र देवी के आगमन का पर्व है। देवी उसी घर में वास करती है, जहां  आंतरिक और बाह्य शुद्धि हो। वह कहती भी है कि मृजया रक्ष्यते (स्‍वच्‍छता से रूप की  रक्षा होती है), स्‍वच्‍छता धर्म है इसीलिए यही पूजा में सर्वोपरि भी है। शरीर, वस्त्र,  पूजास्‍थल, आसन, वातावरण शुद्ध हो, कहीं गंदगी ना हो। यहां तक कि पूजा का प्रारंभ  ही इस मंत्र से होता है -''ऊँ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्‍थां गतोsपिवा।

इसके अलावा  देवीशास्‍त्र में 8 प्रकार की शुद्धियां बताई गई हैं- द्रव्‍य (धनादि की स्‍वच्‍छता अर्थात्  भ्रष्‍टाचार मुक्‍त हो), काया (शरीरिक स्‍वच्‍छता), क्षेत्र (निवास या कार्यक्षेत्र के आसपास  स्‍वच्‍छता), समय (बुरे विचार का त्‍याग अर्थात् वैचारिक स्‍वच्‍छता), आसन (जहां बैठें  उस स्‍थान की स्‍वच्‍छता), विनय (वाणी में कठोरता ना हो), मन (बुद्धि की स्‍वच्‍छता)  और वचन (अपशब्‍दों का इस्‍तेमाल ना करें)। इन सभी स्‍वच्‍छताओं के लिए अलग  अलग मंत्र भी हैं इसलिए आपने देखा होगा कि पूजा से पहले तीन बार आचमन, न्‍यास,  आसन, पृथ्‍वी, दीप, दिशाओं आदि को स्‍वच्‍छ कर देवी का आह्वान किया जाता है।

विडंबना देखिए कि देवी का इतने जोर शोर से आह्वान, बाजारों में चुनरी-नारियल के  ढेर, मंदिरों में लगी लंबी-लंबी लाइनें ''देवी आराधना'' के उस मूलतत्‍व को ही भुला चुकी  हैं जो देवी (स्‍वच्‍छता की ओर) के हर मंत्र में निहित किया गया है। बाजार आधारित इस समय में पूरे नौ दिनों के इस उत्‍सव को लेकर जिस उत्‍साह के दिखावे की हमसे अपेक्षा की जाती है, उसे हम बखूबी पूरा कर रहे हैं। हमारे स्‍मार्टफोन इसके गवाह हैं मगर देवी आराधना की पहली शर्त को हम मानने से इंकार करते हैं, जिसका उदाहरण हैं हमारे आसपास आज भी लगे गंदगी के ढेर।

यह ''अति धार्मिकता'' का प्रकोप ही है कि देवी की मृजया रक्ष्यते की सीख को ध्‍वस्‍त करते हुए बिना कोई शर्मिंदगी दिखाए हम जोर जोर से लाउडस्‍पीकरों व घंटे-घड़ियालों के साथ उच्‍चारित करते जा रहे हैं- या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्‍मीरूपेण संस्‍थिता...नमस्‍तस्‍यै नमस्‍तस्‍यै नमस्‍तस्‍यै नमो नम: .... साथ ही शुभकामनाओं के साथ इस मंत्र का मैसेज फॉरवर्ड भी करते जा रहे हैं... कुछ सेल्‍फियों के साथ और इस अति ने कुछ इसी तरह स्‍वच्‍छता को तिरोहित कर दिया है सो हे देवि अब हमारी शर्मिंदगी भी स्‍वीकार करें।

-अलकनंदा सिंह


सोमवार, 18 सितंबर 2017

एक ट्वीट ने मृणाल पांडे की कलई खोल दी

जब बड़े ओहदे पर रह चुकी नामचीन हस्‍ती मात्र अपनी खुन्‍नस निकालने को मर्यादा के सबसे निचले स्‍तर पर उतर आए और गली कूचों में इस्‍तेमाल की जाने वाली गरियाऊ भाषा को अपना हथियार बना ले तो क्‍या कहा जाए ऐसे व्‍यक्‍ति को।
दैनिक हिन्‍दुस्‍तान की प्रधान संपादक रह चुकीं मृणाल पांडे ने अपनी नकारात्‍मकता को अब चरम पर ले जाते हुए प्रधानमंत्री को उनके जन्‍मदिन पर ही कटु ट्वीट करके यह बता दिया है कि कभी किसी संस्‍थान के उच्‍च पद पर बैठ जाने से जरूरी नहीं कि वह व्‍यक्‍ति बुद्धिमान भी हो जाए।
मैंने पहले भी मृणाल पांडे की नकारात्‍मकता पर लिखा है और आज फिर उन्‍होंने मुझे ही नहीं, पूरे पत्रकार जगत को मौका दे दिया कि अब इस मुद्दे पर बात होनी चाहिए कि ”किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्‍यक्‍ति को किस हद तक गरियाया जा सकता है”।


दरअसल, कल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन 17 सिंतबर पर वरिष्ठ पत्रकार, प्रसार भारती की पूर्व चेयरपर्सन और साहित्यकार मृणाल पांडे ने भी एक ट्वीट किया जिसमें मृणाल पांडे ने लिखा- #JumlaJayanti पर आनंदित, पुलकित, रोमांचित वैशाखनंदन.’ साथ में ये चित्र भी पोस्‍ट किया।
पीएम मोदी पर मृणाल पांडे का ये ट्वीट तब आया है, जब नरेन्द्र मोदी अपना 67वां जन्मदिन मना रहे हैं। मृणाल पांडे के ट्वीट पर लोगों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी और उनके इस ट्वीट को प्रधानमंत्री और स्‍वयं मृणाल पांडे की अपनी गरिमा के खिलाफ बताया। हद तो तब हो गई कि मृणाल पांडे ने कई लोगों जवाब देते हुए कहा कि वो अपने विचार पर कायम हैं।
इस ट्वीट ने पत्रकार जगत को भी भौचक्के में डाल दिया। तमाम पत्रकारों को समझ नहीं आ रहा कि इस पर रिएक्‍ट कैसे करें।
उनके इस ट्वीट की रवीश कुमार, अजीत अंजुम सहित तमाम पत्रकारों ने भी निंदा की और कहा है कि वो इतनी बड़ी हस्ती हैं तो उन्हें सोशल मीडिया पर मर्यादित भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए। किसी के भी जन्मदिन के मौके पर पहले बधाई देने की उदारता होनी चाहिए, फिर किसी और मौक़े पर मज़ाक का अधिकार तो है ही। मृणाल रुक सकती थीं। कहीं तो मानदंड बचा रहना चाहिए. थोड़ा रुक जाने में कोई बुराई नहीं है. एक दिन नहीं बोलेंगे, उसी वक्त नहीं टोकेंगे तो नुक़सान नहीं हो जाएगा.”
पत्रकार अजीत अंजुम ने सोशल मीडिया पर लिखा, “मृणाल जी, आपने ये क्या कर दिया ? पीएम मोदी का जन्मदिन था. देश -दुनिया में उनके समर्थक/चाहने वाले/नेता/कार्यकर्ता/जनता/मंत्री/सासंद/विधायक जश्न मना रहे थे. उन्हें अपने-अपने ढंग से शुभकामनाएँ दे रहे थे. ये उन सबका हक़ है जो पीएम मोदी को मानते-चाहते हैं. ट्विटर पर जन्मदिन की बधाई मैंने भी दी. ममता बनर्जी और राहुल गांधी से लेकर तमाम विरोधी नेताओं ने भी दी. आप न देना चाहतीं तो न देतीं, ये आपका हक़ है. भारत का संविधान आपको पीएम का जन्मदिन मनाने या शुभकामनाएँ देने के लिए बाध्य नहीं करता. आप जश्न के ऐसे माहौल से नाख़ुश हों, ये भी आपका हक़ है लेकिन पीएम या उनके जन्मदिन पर जश्न मनाने वाले उनके समर्थकों के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल करें, ये क़तई ठीक नहीं.”
आश्‍चर्य होता है कि अपनी उम्र के उत्‍तरार्द्ध में आकर ”भाषा के बूते” ही साहित्‍य में अमिट छाप छोड़ने वाली कथाकार शिवानी की पुत्री मृणाल ही उस ”भाषा की मर्यादा” को तार-तार कर रही हैं। मृणाल पांडे उनकी जैविक पुत्री अवश्‍य हैं परंतु बौद्धिक पुत्री नहीं हो सकतीं। हमें ध्यान रखना चाहिए कि हमारी भाषा शैली और व्यवहार से हमारे चरित्र का बोध होता है इसलिए दैनिक जीवन में अपनी भाषा के उपयोग को लेकर हमें सजग रहना चाहिए, फिर सोशल मीडिया के किसी प्‍लेटफॉर्म पर तो और भी सतर्कता बरतनी चाहिए, परंतु मृणाल ऐसा न कर सकीं। इसे यथार्थवाद या मज़ाक भी तो नहीं कहा जा सकता।
प्रधानमंत्री के पद पर बैठे एक व्यक्ति के लिए खुद को हिन्दुस्तान की प्रथम महिला संपादक होने का तमगा देने वाली महोदया की ऐसी भाषा और अभिव्यक्ति पर सिर्फ अफ़सोस के और कुछ नहीं किया जा सकता। परंतु वरिष्‍ठ पत्रकारों द्वारा इसको ”अनुचित” कहना, अच्‍छा लगा वरना इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया (चूंकि प्रिंट मीडिया की प्रतिक्रिया त्‍वरित नहीं होती ) अपनी बिरादरी के माननीयों के शब्‍दों को दाएं-बाएं करने में माहिर है। जहां तक मुझे लग रहा है कि गौरीलंकेश की हत्‍या के बाद ये सुखद परिवर्तन आया है। अब ये परिवर्तन स्‍थायी है या नहीं, कहा नहीं जा सकता।
आमतौर पर कहा जाता है कि अब कोई 60 की उम्र होने पर ही नहीं सठियाता, वह अपनी सोच से सठियाता है। जिन्‍होंने मृणाल पांडे के साथ काम किया है, वे अच्‍छी तरह जानते हैं कि भारी भरकम शब्‍दों को उन्‍होंने किस तरह ढोया है, अब वो थक चुकी हैं और थकान में नकारात्‍मकता आ ही जाती है, ट्विटर पर ये अपनी मानसिक थकान उतार रही हैं। इस एक ट्वीट ने मृणाल पांडे को कहां से कहां पहुंचा दिया, सारी कलई उतर गई है उनकी।
मृणाल पांडे की सोच पर इब्न-ए-इंशा का ये शेर बिल्‍कुल मुफीद बैठता है-
”शायर भी जो मीठी बानी बोल के मन को हरते हैं
बंजारे…जो ऊँचे दामों जी के सौदे करते हैं।”
-अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

ऐसा कहां होता है भाई...कि मारौ घोंटूं फूटी आंख ?

ब्रज में ये कहावत बहुत प्रचलित है-  ''मारौ घोंटूं फूटी आंख'', यानि कुछ किया और कुछ और ही हो गया, यूं इसके शब्‍द विन्‍यास से आप लोग समझ पा रहे होंगे कि जब घुटने में मारने से आंख कैसे फूट गई, तो आप सही सोच रहे हैं और यही तो मैं भी कहना चाह रही हूं कि घुटने में मारने से आंख नहीं फूटा करती। और जब ऐसा किया जा रहा हो तो निश्‍चित जानिए कि समस्‍या को छुपाया जा रहा है और इसके हल करने में बेइमानी की जा रही है क्‍योंकि सही इलाज के लिए जब तक समस्‍या की जड़ तक न पहुंचा जाए तब तक उसका हल हो पाना असंभव होता है।

मेरे सामने इसी कहावत से जुड़ा एक वाकया कल तब सामने आया जब मुझे एक डॉक्‍टर मित्र (चूंकि अब फैमिली डॉक्‍टर नहीं होते) के केबिन में जाने का ''सुअवसर'' प्राप्‍त हुआ। इसे सुअवसर इस लिए कह रही हूं कि धरती पर मौजूद इन कथित भगवानों ने ही उक्‍त कहावत का सर्वाधिक उपयोग (अब ये आप पर निर्भर है कि इसे सदुपयोग कहें या दुरुपयोग) किया है।

फिलहाल का वाकया कुछ यूं है कि डॉक्‍टर साहब के सामने ग्रामीण तथा गरीब नजर आ रहे एक 80-90 वर्षीय वृद्ध हांफते हुए आए और बोले कि मेरी पीठ में नीचे की तरफ बहुत दर्द है, 5 दिन से शौच नहीं गया, आज गया तो शौच के वक्‍त 2-4 गांठें निकलीं, सांस फूल रही है और भूख नहीं लग रही...जबकि इन पांच दिनों से पहले मैं अच्‍छा था, डॉक्‍टर साहब ने वृद्ध की पीठ चेक की, पूछा-कहीं चोट-वोट तो नहीं लगी या गिर-विर तो नहीं पड़े, वृद्ध के मना करने पर डॉक्‍टर साहब ने पास ही खड़े उसके बेटे को 'पर्चा' (खर्रा भी कह सकते हैं) थमाया, बोले- फलां-फलां रूम नं. में जाओ और इनका ईसीजी करा लाओ।

अरे भाई, जब ''5 दिन'' से पेट खराब है, शौच की तकलीफ है, तो जाहिर है कि वृद्ध के पेट में गैस बन रही है जो ज्‍यादा बनने पर धमनियों तक प्रेशर डालती है और फिर इससे सांस फूलती है। यह सीधी-सीधी पेट की समस्‍या थी, इसमें ईसीजी की क्‍या आवश्‍यकता है भला। 200 फीस के और 500 ईसीजी के, सो डॉक्‍टर साहब ने 700 सीधे किए। दवाइयां पेट साफ की ही दीं गईं मगर ''चूना'' लगा दिया ईसीजी का। रोग कोई लेकिन टेस्‍ट किसी और का फिर चाहे वृद्ध इस टेस्‍ट के बाद हमेशा ''दिल का रोगी'' होने के भय में जिया करे। यूं तो इसके चिकित्‍सकीय निहितार्थ अनेक हैं, उन पर फिर कभी चर्चा होगी, मगर सच में चोट घुटने में थी यानि पेट खराब था और डॉक्‍टर ने आंख फोड़ दी यानि ईसीजी करवा दिया । पेट के रोग का कष्‍ट इतना नहीं था जितना कि दिल के रोग का भय तारी हो गया वृद्ध के ज़हन पर।

इसी कहावत ''मारौ घोंटूं फूटी आंख'' का दूसरा उदाहरण आज का हिंदी दिवस है।
सोशल मीडिया से लेकर चर्चाओं-गोष्‍ठियों में आज पूरा देश हिंदीमय दिखाई देगा मगर  इधर दिवस समाप्‍त, उधर हिन्‍दीप्रेम गायब। कॉन्‍वेंट स्‍कूलों में अपने बच्‍चों को पढ़ाकर  इतराने वाली 'मॉम्‍स', हिन्‍दी पर ''डिबेट'' के लिए इंटरनेट की ''हेल्‍प'' से बच्‍चों को  ''डिक्‍टेट'' कर रही हैं और सिखाते हुए पूछ भी रही हैं कि ''टेल मी बेटा, हू इज  मैथिलीशरण गुप्‍त, यू मस्‍ट लर्न योर पॉइम व्‍हिच आई हैव गिव इट टू यू, गिव योर  बेस्‍ट इन क्‍लास'' ।

राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी की इस दशा (आशावादी होने के कारण मैं इसे अभी दुर्दशा नहीं कहूंगी)  पर उक्‍त कहावत ''मारौ घोंटूं फूटी आंख'' एकदम खरी उतरती है। बच्‍चे में प्रथम  संस्‍कार देने वाला घर और मां ही जब बच्‍चे को अपनी रोमन लिपि में हिन्‍दी पर 'डिबेट'  के लिए 'लेसन' देगी, तो कोई भी सरकार या कोई भी भाषाविज्ञानी एड़ीचोटी का जोर  लगा ले, वह बच्‍चे को हिन्‍दी नहीं सिखा सकता। और यदि सिखा भी दी, तो अपनी  राष्‍ट्रभाषा के लिए सम्‍मान नहीं पैदा कर सकता, राष्ट्रभाषा के प्रति प्रेम आदर राष्ट्र की एकता और अखंडता का जनक है। बात यहां भी वही है कि रोग हमारे  घर में है और इसका इलाज हम गोष्‍ठियों-परिचर्चाओं में ढूढ़ रहे हैं।

''मारौ घोंटूं फूटी आंख'' कहावत का लब्‍बोलुआब ये है कि घुटने में मारने से आंख नहीं  फूटा करती, जिस तरह पेट का रोग ईसीजी टेस्‍ट से ठीक नहीं हो सकता, ठीक उसी  तरह हिन्‍दी को भी रोमन ट्रांसलेशन के ज़रिये ''अपनी राष्‍ट्रभाषा'' नहीं बनाया जा  सकता। हमारी नज़र में ये कहावतें भले ही हमसे कम शिक्षितों ने बनाई हों मगर ये  रोजमर्रा की ज़िंदगी में जितना कुछ सिखा जाती हैं, उतना तो आज हम तमाम डिग्री  लेकर भी नहीं सिखा सकते।
ये भारतवर्ष अपनी जिजीविषाओं के लिए जाना जाता है  और पेशे से गद्दारी हो या भाषा से धोखा, दोनों ही अपने अपने अस्‍तित्‍व के लिए  खतरनाक हैं। हम मुलम्‍मों के सहारे कब तक अपना और अपनी भाषाओं का विकास  कर पाऐंगे।

बेहतर तो यही होगा कि हम घुटने पर मार के कारण आंख के फूट जाने का इल्‍ज़ाम ना लगाएं  वरना समस्‍या जस की तस बनी रहेगी और यह स्‍थिति इलाज न करके इल्‍ज़ाम तक  ही सीमित रह जाएगी क्‍योंकि यह तरीका समस्‍या  से मुंह फेर लेने के अलावा कुछ है ही नहीं। सो मारौ घौंटू ना ही फूटै आंख...हैप्‍पी हिन्‍दी डे...☺☺☺☺    

-अलकनंदा सिंह

बुधवार, 6 सितंबर 2017

कोई पूछे तो सही, अशोक अब तक वाजपेयी क्‍यों हैं

रामकुमार वर्मा ने अपने महाकाव्‍य ''एकलव्‍य'' में लिखा है, ''तुम नहीं वत्‍स, यह समय  ही शूद्र है''। हमेशा से ही ''शूद्र'' शब्‍द को दलितों का प्रतीक माना जाता रहा जबकि ''शूद्र''  कोई जाति नहीं एक उपमा है जो निम्‍नतर होते विचारों, मूल्‍यों, भावनाओं, विवेक और  संकल्‍पों को हमारे सामने ठीक उसी तरह लाती है जिस तरह आजकल कुछ खबरें ला  रही हैं। यह खबरें जनसामान्‍य की सोच पर अपने विकृत रूप में छा जाने को बेताब हैं।  हद तो ये है कि इन शूद्र खबरों का स्‍त्रोत धन-बुद्धि से संपन्‍न वह लोग हैं जो कुछ करने  में नहीं, सिर्फ बोलने में विश्‍वास रखते हैं। उन्‍हें अपनी सोच के विपरीत ''किया जाने  वाला'' हर काम खुद पर कुठाराघात सा लगता है और वे तिलमिला उठते हैं।

यही इस ''शूद्र समय'' का उदाहरण है कि धन-बुद्धि से संपन्‍न ऐसे लोगों को- गरीबी के  कारण बच्‍चों समेत आत्‍महत्‍या करती मां दिखाई देती है, आत्‍महत्‍या करते किसान दिखते  हैं, चीन से विवाद दिखाई पड़ता है, रोहिंग्‍या मुसलमान दिखाई देते हैं, गिरती हुई जीडीपी  और अर्थव्‍यवस्‍था दिखती है, गोरखपुर में मरते बच्‍चे भी दिखते हैं, एंटीरोमिओ स्‍क्‍वायड  दिखता है, कश्‍मीर में मानवाधिकारों का कथित हनन तो इन्‍हें सोते जागते दिखाई देता  है...सब-कुछ दिखता है, मगर मोटे लेंस और काली पड़ चुकी भद्दी कमानी वाले चश्‍मे से  कुछ भी वो दिखाई नहीं देता जो आशा उत्‍पन्‍न करता हो। जिससे महसूस हो रहा हो कि  किसी भी स्‍तर पर ऐसे तत्‍वों की सोच कुछ अच्‍छा भी देख लेती है।  AC दफ्तरों के  भीतर पड़ी चिक से झांकते हुए...ये स्‍वयंभू बुद्धिजीवी चुनचुन कर उन खबरों की कटिंग  इकठ्ठी करते हैं जो इनकी ''शूद्र'' सोच को खाद पानी दे सके। ये अखबारी खबरों से आगे  वहां कभी नहीं देखते जहां उनकी सोच का दायरा खत्‍म होता हो।

यह समय ही शूद्र है, तभी तो जो बुद्धि के बूते खाते-कमाते हैं, वे बुद्धिजीवी अब अपने  असहिष्‍णुता के नारे के लिए अलग चाशनी ढूढ़ रहे हैं।
इसी प्रयास में अवार्ड वापसी के नायक अशोक वाजपेयी ''सत्‍याग्रह'' ब्‍लॉग में लिखते हैं-  ''इस समय असहमति को दबाने, उसे हाशिए पर धकेलने या दंडित करने का जो  अघोषित व व्‍यापक अभियान चल रहा है, उसमें राजनीति, धर्म, राज्‍य, मीडिया और  विशेषत: सवर्ण जातियां शामिल हैं। मुझे समझ में नहीं आता कि इन महाशय ने  आजतक अपने नाम के साथ ''वाजपेयी'' क्‍यों जोड़ा हुआ है। क्‍या इन्‍हें किसी ने बताया  नहीं कि नाम के साथ चिपकी हुई उनकी यह जाति न केवल उनके बल्‍कि उनके मां-बाप  के भी किसी सुनियोजित षड्यंत्र का पर्दाफाश करती है।
किसी ने शायद कभी पूछा भी नहीं कि दलितों के खिलाफ हमेशा से क्रूर रहे सवर्णों की  संतान अशोक ''वाजपेयी'' नामक शख्‍स को अपने सवर्ण होने पर शर्म महसूस होती है  या नहीं।
जबकि उनके द्वारा इतने मंचों से झूठ फैलाया और बोला जा रहा है कि लोग उसे ही  सच मानने लगे हैं।''

निश्‍चित ही वाजपेयी जी ने अपनी बुद्धि के हिसाब से जो लिखा, वह बताता है कि वे  अपने ही कौशल ही नहीं ''अस्‍तित्व'' को लेकर भी कितने भ्रमित हैं।
खैर...ऐसा ही होता है जब 'ज़मीन पर' आपको अपने आप से करने के लिए कुछ ना  मिले और सरकारी पैसे से बहुत कुछ मिल रहा हो। वो सबकुछ जिसकी कल्‍पना तक  कोई आम आदमी नहीं कर सकता। ज़ाहिर है कि घर बैठे-बैठे हराम की कमाई से किया  जाने वाला निठल्‍ला चिंतन नकारात्‍मकता को पनपने के लिए अच्‍छा स्‍पेस दे देता है।


वाजपेयी जी हताश होकर जिनकी ओर इशारा कर रहे हैं उन्‍होंने अगर असहमति को  दबाया होता तो लंदन के मौरिस स्कूल ऑफ हेयर ड्रेसिंग और लंदन स्कूल ऑफ फैशन  से आर्ट एंड साइंस ऑफ हेयर स्टाइलिंग एंड ग्रूमिंग में डिप्लोमा प्राप्‍त करने के बाद  देशभर में अपने सलून की 200 शाखाएं चला रहे जावेद हबीब अपने सलून में हिन्‍दू देवी  देवताओं को मैनीक्‍योर-पैडीक्‍योर, हेयर कटिंग कराते एवं लिपस्‍टिक लगाते दिखाने का  दुस्‍साहस नहीं करते।

हालांकि प्रिंट मीडिया में दिए गए इस विज्ञापन के माइक्रोब्‍लॉगिंग साइट ''ट्विटर'' पर  पोस्‍ट होते ही यूजर्स ने #boycottJavedHabib हैशटैग चलाकर अपनी प्रतिक्रिया दी और  कहा कि फेमस हेयर ड्रेसर जावेद हबीब! इससे क्या होगा, हम तो अब तभी मानेंगे जब  प्रोफेट को बाल कटवाते हुए दिखाओ। हिंदू धर्म का मजाक बना कर रक्खा है। कोई  अश्लील पेंटिग बनाता है कोई कुछ, कोई उन्‍हें जूतों में तो कोई शैम्‍पेन पर बैठा देता है।  कुछ ट्वीट्स देखिए-
Hey Javed Habib - Quite Unfair!! You should have ALSO put that Prophet  Muhammad pic when he visited your salon for a manicure! #JavedHabib

Will Javed Habib come with advertisement depicting Prophet Mohammad  getting his Beard trimmed at his salon?? Why are Hindus on target???

जब सारा बवाल बढ़ने लगा तो ''व्‍यावसायिक-बुद्धि'' वाले जावेद हबीब ने माफी मांगते हुए  एक ट्वीट कर अपने ग्राहकों को पटाने की कोशिश की-
Our Ad was not published to hurt anyone's sentiments...we sincerely  apologise.

मगर बात तो निकल चुकी थी। अच्‍छी बात ये है कि जावेद हबीब के इस विज्ञापन का  विरोध उस हाईटेक पीढ़ी ने किया जिसे हम अमूमन भगवान और धर्म को ''ना मानने  वाला'' कहते रहते हैं और गाहे-बगाहे उन्‍हें अवज्ञा का दोषी मानने से भी परहेज नहीं  करते। ये वही पीढ़ी है जो सफाई से लेकर गरीब बच्‍चों, बूढ़े मां-बाप तथा सामाजिक  कार्यों के लिए भी एप बना रही है और अपनी सुविधाओं को छोड़कर इनके लिए ज़मीन  पर काम कर रही है। ये पीढ़ी सिर्फ बैठकर गाल नहीं बजाती, ये राजनीति में भी उतनी  ही सक्रिय दिखती है जितनी कि मॉल में, पिज्‍जा हट और एमएनसी दफ्तरों में। ये वही पीढ़ी है जो धर्म के असली मायने भी जानती है और उन्‍हें निबाहना भी, राष्‍ट्र के लिए वह क्या कर सकती है, ये भी जानती है, और गाल भी नहीं बजाती।

जहां तक बात जिन ''गरीबों'' की आड़ लेकर सोकॉल्‍ड बुद्धिजीवियों द्वारा तिलमिलाने की  है या अभिव्‍यक्‍ति की आजादी पर रूदाली बनने की है, तो इनसे पूछा जाना चाहिए कि  स्‍वयं इन्‍होंने इस सबके लिए क्‍या प्रयास किए, क्‍या ये बतायेंगे। नहीं बता सकते क्‍योंकि  किसी यूनीवर्सिटी के किसी कॉलेज की फैकल्‍टी-बतौर गाल बजाना आसान है और ज़मीन  पर काम करना उतना ही मुश्‍किल। 

सो अशोक वाजपेयी जी यह समय ही शूद्र है, तभी तो आप जैसों की खेप न स्‍वतंत्रता के  मायने समझी और न प्रगति की व्‍याख्‍या कर पाई। और जब लोग जागे हैं तो बजाय इस  जागरूकता को व्‍यवस्‍थित करने में योगदान देने के, आप इसे असहिष्‍णुता और  असहमति का कुचक्र बता रहे हैं। ज़रा अपनी किताबों के पन्‍नों से बाहर निकल कर  आइये और देखिए कि बाहर की आबोहवा कितना सुकून देती है। वह दौर बीत गया जब  एक लेख या कविता से सत्‍ता पलटने का सपना बुना जाता था, यह समय और है।  इसकी नब्‍ज़ पहचानिए वरना आने वाली पीढ़ी आपको हिकारत की नजर से देखेगी और  सम्‍मान का पात्र वही होगा, जिसने धरातल पर ''कुछ करके दिखाया'' हो।

- अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

गुरूदीक्षा लेने के कुचक्र के आफ्टरइफेक्‍ट हैं ये सब...

अभीतक तथाकथित आधुनिकता की आड़ में जो लोग ज्‍योतिषीय आंकलन को ढपोरशंखी बताया करते थे, वे इस प्राचीन  विद्या के वैज्ञानिक पक्ष से पूर्णत: अनभिज्ञ रहे और हम सतही जानकारियों के बूते इस विज्ञान का दुरुपयोग करने वाले  उन ''पंडितों'' के दुष्‍चक्र में फंसते चले गए जो आमजन से लेकर संभ्रान्‍तजन तक को बरगला कर अपना ''धंधा'' चलाते  रहे। इन पंडितों और ऐसे ही अन्‍य धंधेखोरों के कारण ज्‍योतिष को बतौर 'नक्षत्र विज्ञान' कब का भुलाया जा चुका है।  अभी भी इसके बारे में बात करने भर से आपको दकियानूसी, पिछड़ा, दक्षिणपंथी या समाज की प्रगति का दुश्‍मन आदि  कुछ भी कहा जा सकता है...।

कॉस्‍मिक किरणें-दिशा ज्ञान और नक्षत्र विज्ञान पर यूं तो कितना ही कुछ शोधों के द्वारा सिद्ध किया जा चुका है मगर  इस पर बात फिर कभी करेंगे। फिलहाल इसी नक्षत्र-विज्ञान के अनुसार सौरमंडल में जो कुछ ग्रह अपनी वक्र गति (  retrogate) से चल रहे हैं उनके कारण समाज में जो कुछ भी गलत हुआ है उसकी साफसफाई का समय आ गया है और  इसी कारण दशकों से जमे ''बाबाओं'' के डेरे-आश्रमों से लेकर विदेश के स्‍थापित साम्राज्‍यों व विनाशक शक्‍तियों तक सभी  में उथलपुथल मची है...प्रकृति का मंथन तेज हो रहा है ताकि जो अग्रहणीय है उसे निकाल बाहर किया जाए और इस  तरह ये मंथन-गति संतुलन की ओर बढ़ रही है ।

इसी मंथन से संबंधित दो वाकये बताती हूं-  पहला तो यह कि दो दिन पहले अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्‍यक्ष  नरेंद्र गिरि ने प्रेस कांफ्रेंस कर कहा था कि फर्जी संतों-बाबाओं को सनातन धर्म की परंपराओं से खिलवाड़ नहीं करने दिया  जाएगा। हम इसके खिलाफ कार्यवाही करेंगे।  कल इसी संदर्भ में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने स्‍वयंभू संत  महात्‍माओं को फर्जी बताते हुए उन्हें साधु संन्‍यासी संत या बाबा मानने से इंकार कर दिया है। इतना ही नहीं इन्‍हें संत  या महात्‍मा कहे जाने पर भी आपत्‍ति जताई है क्‍योंकि ये सनातन हिंदू परंपरा या अखाड़ा व्‍यवस्‍था के अंग नहीं हैं और  न ही ये साधु संन्‍यासी हैं। परिषद की ओर से सभी 13 अखाड़ों को एडवाइजरी जारी की गई है कि उन्‍हें अपने यहां  स्‍थापित समिति के अनुमोदन के बाद ही संतों महामंडलेश्‍वरों को मान्‍यता दिये जाने की सलाह दी है। इन 13 अखाड़ों में  निरंजनी, आनंद, महानिर्वाणी, अटल, बड़ा उदासीन, नया उदासीन, निर्मल अखाड़ा,जूना, अव्‍हान,अग्‍नि, दिगंबर  अणि,निर्वाणी अणि और निर्मोही अणि शामिल हैं।

दूसरा वाकया है कि -  कल जिस समय अखाड़ा परिषद हरिद्वार में ये एडवाइजरी जारी कर रही थी ठीक उसी समय  धर्मनगरी हरिद्वार से ही ताल्लुक रखने वाले एक पीठाधीश्वर रहे एक 'बाबा' का बीच सड़क कार की बोनट पर लड़की को  'किस' करते फोटो के सोशल मीडिया पर वायरल होने से चर्चाओं का बाजार गरम है, फोटो लोकेशन दिल्ली-आगरा यमुना  एक्सप्रेस हाईवे की बताई जा रही है, इस पर अधिकारिक रूप से मुंह खोलने को तैयार नहीं। मामले की जानकारी और  फोटो अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद तक भी पहुंचा दी गई।

फोटो में दिख रहे बाबा हरिद्वार-देहरादून रोड पर स्थित एक आश्रम से जुड़े बताए जा रहे हैं हालांकि इन कथित बाबा के  चेलों द्वारा सफाई दी जा रही है कि फोटो पुराना है और वह काफी समय पहले हरिद्वार से दिल्ली आश्रम चले गए हैं  और अब वह कभी-कभार ही यहां आते हैं। उन्होंने दिल्ली स्थित आश्रम में ही अपना स्थायी डेरा बना लिया है मगर ये  तो सफाईभर है ना। अभी हम इतने आधुनिक भी नहीं हुए हैं कि एक पीठाधीश्वर संत को सरेआम किस करते और  सामाजिक सभ्‍यता के मापदंडों व मर्यादाओं की धज्‍जियां उड़ाते देखते रहें और प्रतिक्रिया भी ना दें।

हम सब जानते हैं कि सनातन धर्म में गृहस्‍थ संतों को भी उतना ही महत्‍व दिया जाता रहा है जितना कि वैरागियों को  मगर उच्‍छृंखलता को न कोई समाज मान्‍यता देता है और ना ही धर्म। समाज में व्‍यवस्‍था बनाए रखने के कुछ नियम  होते हैं, और धर्म संवाहकों से इन्‍हें मानने की अपेक्षा सर्वाधिक होती है। मंदिरों-मठों में व्‍यभिचार की खबरें पहले भी आती  रही हैं मगर अब ये सीमायें पार कर चुकी हैं। इनकी सफाई इनके भीतर से ही शुरू होनी चाहिए। गेरुए वस्‍त्रों की महिमा  और सनातन धर्म की खिल्‍ली इस 'बाबा' जैसे न जाने ''कितने और बाबा'' उड़ा रहे होंगे, इस संबंध में अखाड़ा परिषद को  सिर्फ एडवाइजरी जारी करके ही नहीं चुप रह जाना चाहिए बल्‍कि उन बाबाओं के खिलाफ कानूनी कार्यवाही भी करनी  चाहिए। आज सड़क पर किस करते बाबा का फोटो वायरल हुआ है, कल को कोई ऐसा ही बाबा सड़क पर शारीरिक संबंध  बनाता दिख जाए तो फिर आश्‍चर्य कैसा, बेलगाम इच्‍छाऐं और धर्म की आड़ में इन बाबाओं की असलियत सामने आनी  ही चाहिए।

इसके साथ ही हमें ''गुरूदीक्षा लेने के कुचक्र'' की ओर भी ध्‍यान देना होगा जो हमारे आसपास अंधश्रद्धा के रूप में फैलाया  जाता है कि मोक्षप्राप्‍ति के लिए किसी गुरू की का होना अति आवयश्‍क है। ये सारी बातें कतई निराधार हैं जबकि स्‍वयं  गुरुओं के गुरू दत्‍तात्रेय ने कहा है कि ये उर्वर पृथ्‍वी, ये खुला आकाश, ये बहती हवाऐं, ये जलती आग, ये बहता पानी, ये  सुबह उठता सूरज, ये रात बितातात चांद, ये इतराती तितलियां, ये शहद बनाती मक्‍खियां, ये मदमस्‍त हाथी, ये व्‍यस्‍त  चीटियां, ये जाल बुनतीं मकड़ियां, कुलांचे भरते हिरन, चहचहाती चिड़ियां, अबोध बच्‍चे, बर्बर शिकरी, जहरीले सांप, ये सब  गुरू ही तो हैं। जब प्रकृति की हर गतिविधि हमारी गुरू हो सकती है तो इन ''बाबाओं'' के कुचक्र से बचना कोई असंभव  कार्य तो नहीं। क्‍या हम गुरू दत्‍तात्रेय के कहे इन वाक्‍यों को झ़ठला सकते हैं, नहीं, इन बाबाओं को साइडबाइ करने का  एक ही फॉर्मूला है कि बस थोड़ी नजर चौकस और थोड़ी अपने प्रति विश्‍वास व अपनों के प्रति श्रद्धा...और क्‍या।  

-अलकनंदा सिंह 

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

ठहरिए…देखिए…कहीं आपका टटलू न कट जाये

लव मैरिज, मनचाहा प्‍यार, वशीकरण, गृहक्‍लेश, जादूटोना, विदेश यात्रा, कारोबार में रुकावट, शादी में अड़चन, रूठों को मनाना, कोख में बाधा, किया कराया, पति पत्‍नी में अनबन, सौतन व दुश्‍मनी से छुटकारा, संतान प्राप्‍ति, मुठकरनी, A to Z समस्‍याओं का हल पाएं…सही काम एक ही नाम…दुआ भी तकदीर बदल देती है…हम कहते नहीं, करके दिखाते हैं….बाबा मिर्जाखान जी बंगाली। यह दावा है उस पैम्‍फलेट का जो अखबार के साथ आया था।
इसके आगे लिखा है- अगर मेरी एक आंख की रोशनी मुसलमान भाई हैं तो दूसरी आंख की रोशनी हिन्‍दू भाई हैं। पैम्‍फलेट में नीचे दोनों ओर शिरडी के साईं का फोटो भी है।
और हिदायतन साथ में ये भी लिखा था कि मन में सच्‍ची श्रद्धा लेकर ही फोन करें। हमारी एक कॉल ”आपकी” किस्‍मत बदल सकती है।
इसके भी ठीक नीचे दो सेलफोन नं. लिखे थे जिन पर ”समस्‍याग्रस्‍तों” को निजात दिलाई जानी है।
12×8 इंच का पीले-गुलाबी रंग के जर्जर कागज पर छपा पैमफ्लेट उन सभी समाज सुधारकों, अंधश्रद्धामूलकों, आंतरिक सुरक्षा एजेंसियों, कानून-व्‍यवस्‍था देखने वालों, समाज को भयमुक्‍त कराने वालों के प्रयासों पर हावी होने का भरपूर प्रयास करता दिख रहा है।
इसका यह प्रयास अगर कुछ प्रतिशत भी सफल होता है तो निश्‍चित जानिए फिर इस पैम्‍फलेट वाले ”बाबा मिर्जाखान जी बंगाली” को ”बाबा राम रहीम” बनने से कौन रोक सकता है। समय लग सकता है मगर ये प्रक्रिया सतत चलती रहेगी क्‍योंकि व्‍यक्‍ति बैठे-बिठाए समस्‍या का निराकरण किए जाने का लालच और ”अंधभक्‍ति की आदत” उन्‍हें किसी न किसी बाबा के ”फेरे” लगाने को उनके ”ठिकानों” पर लाती ही रहेगी।
एक और उदाहरण देती हूं-
हमारे ब्रज में ”टटलुओं” का बड़ा आतंक है, ग्रामीण क्षेत्रों के ”निकम्‍मे” (इन्‍हें बेराजगार न समझा जाए) और आपराधिक प्रवृत्‍ति वाले हट्टे-कट्टे युवकों द्वारा सेल-परचेज वेबसाइट ओएलएक्‍स पर विज्ञापन देकर गुजरात-महाराष्‍ट्र-दक्षिणी प्रदेशों के लोगों को ”सस्‍ती कार” या ”सस्‍ती सोने की ईंट” देने का झांसा दिया जाता है, विज्ञापन देखकर लोग आते भी हैं और इनके जाल में फंसते भी हैं, गिरि गोवर्धन का क्षेत्र तो इन टटलुओं की पूरी तरह गिरफ्त में हैं जो उत्‍तरप्रदेश-राजस्‍थान-हरियाणा तीन प्रदेशों की सीमाओं को कवर करता है। कई बार सीमाक्षेत्र का विवाद इन्‍हें निष्‍कंटक अपना टारगेट पूरा करने में सहायक होता है। कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब पुलिस इन्हें लेकर शिकायतों और कार्यवाहियों से रूबरू न होती हो। यात्रियों को सावधान करने के लिए गोवर्धन क्षेत्र में पुलिस ने एहतियातन होर्डिंग्‍स भी लगवाए, प्रचार भी कराया मगर सब नाकाफी। फिलहाल टटलू सिंडीकेट अपना जलवा कायम रखे हुए आगे ही बढ़ रहा है क्‍योंकि फंसने वालों के लालच को कम करने का पुलिस के पास कोई उपाय नहीं है जबकि टटलुओं के पास चुग्‍गा फेंकने के तमाम साधन हैं। ऑनलाइन साधन इसमें इजाफा ही कर रहे हैं।
इन बेरोजगार ठगों का जाल पूरी रिसर्च के साथ फैलाया जाता है, जो व्‍यक्‍ति फंसता दिखता है उसे पहले फोन से यहां बुलाया जाता है ”माल दिखाने” के लिए फिर निश्‍चित दूरी पर खड़े टटलू गिरोह के सदस्‍य उसे पहले बातों में फिर धमकियों से डिमॉरलाइज करके उसे लूटकर भाग जाते हैं, घटना की आखिरी कड़ी ये होती है कि शिकार थाने में मुंह लटकाए कानून-व्‍यवस्‍था को कोस रहा होता है। निश्‍चित ही आमजन की सुरक्षा पुलिस का दायित्‍व है मगर शिकार हुए कथित ”भोले भाले” व्‍यक्‍ति को उसके ”अपने लालच” से कौन बचाएगा। तो क्‍या पुलिस को अब इसके लिए भी रिहैब सेंटर्स खोलने चाहिए। इनसे बचने को जो जागरूकता चाहिए वो किसी बाबा या सुरक्षा एजेंसी अथवा सरकार के सिखाए से नहीं स्‍वयं के सोचने से आएगी। टटलुओं के शिकार होने वाले सभी शिक्षित होते हैं, इसलिए इन्‍हें ”निरीह शिकार” मानकर और इन पर रहम खाकर हम इनके लालच को पोषित कर रहे हैं, इसके अतिरिक्‍त और कुछ नहीं। और ये पोषित लालच ही आगे कहीं किसी बाबा के चक्कर में नहीं फंसेगा, ये कैसे कहा जा सकता है।
क्‍या आप समझते हैं कि ये भय और भावनाओं के इस मायाजाल में सिर्फ आर्थिक व मानसिक रूप से कमजोर ही फंसते हैं, ऐसा नहीं है। इनका टारगेट सिर्फ वे लोग ही होते हैं जो ऊपर लिखे गए पैम्‍फलेट में बाबा मिर्जाखान जी बंगाली के टारगेट होंगे। हो सकता है कि शिकायत किए जाने पर पुलिस बाबा मिर्जाखान बंगाली को कब्‍जे में ले ले मगर फिर और कोई बाबा मिर्जाखान बंगाली या बाबा रामरहीम अपना साम्राज्‍य नहीं फैलाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं।
ये भय और भावनाओं का कॉकटेल है जो समाज से ही उठता है और समाज में ही धन, संतान, व्‍यापार तथा संपत्‍ति के ”लालचियों” को अपने कब्‍जे में ले लेता है, ये शिकारी ठग चाहे वो बाबा मिर्जाखान जी बंगाली हो, रामहीम हो, आसाराम बापू हो या फिर ब्रजक्षेत्र के टटलू हो ”लालच” को तलाशते हैं तराशते हैं और फिर वही होता है जो डेरा सच्‍चा सौदा में होता रहा या आगे भी किसी ”अड्डे” पर होता दिख जाएगा। सच ये भी है कि इन टटलुओं की आकार, रूप, रंग और जगह बदल सकती है मगर इनका वजूद खत्‍म नहीं होगा। इनके कुकृत्‍यों के प्रति सचेत रहना ही बस एकमात्र उपाय है।
जो बाबा लव मैरिज, मनचाहा प्‍यार , वशीकरण, गृहक्‍लेश, जादूटोना, विदेश यात्रा, कारोबार में रुकावट,शादी में अड़चन, रूठों को मनाना, कोख में बाधा, किया कराया, पति पत्‍नी में अनबन, सौतन व दुश्‍मनी से छुटकारा, संतान प्राप्‍ति, मुठकरनी, A to Z समस्‍याओं से निजात दिलाने को कुछ पैम्‍फलेट छपवा कर स्‍वयं का विज्ञापन करने को बाध्‍य है, वो आमजन की समस्‍याओं को दूर करने का ठेका ले रहा है, आखिर कैसे।
समाज में किसी भी अनजान गतिविधि पर जब प्रश्‍न उठना बंद हो जाते हैं, जब लोग अंधश्रद्धा या अंधभक्‍ति की ओर मुड़ते हैं तब बाबाओं के डेरे ऐसे ही हमें ठगने को तैयार दिखते हैं ये ठग हमारा टटलू काटने से बाज नहीं आते। तो आप भी अपने आसपास कौन, कैसे, क्‍यों, कहां,कब, किसलिए जैसे प्रश्‍नों को संचारित करें ताकि फिर कोई बाबा हमें हमारे समाज को बेवकूफ ना बना सके, फिर कोई ठगी ना कर सके।
-अलकनंदा सिंह

बुधवार, 23 अगस्त 2017

बेबी बंप: एक्‍सपोज...एक्‍सपोजर...एक्‍सपोज्‍ड


एक्‍सपोजर पाने को एक्‍सपोज्‍ड होने की ललक आपको किस-किस तरह से एक्‍सपोज करेगी, यह अगर  देखना है तो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही उन तस्‍वीरों को देख लीजिए जिनमें बॉलीवुड की  अप्‍सराएं स्‍वयं को खपाए दे रही हैं।

इस मानसिकता को समझने में खलील ज़िब्रान की यह कहानी काफी मदद कर सकती है-

एक दिन 'खुबसूरती' और 'बदसूरती' एक समुद्र तट पर मिलीं और बोलीं आओ, चलो समुद्र में नहाते हैं।  दोनों समुद्र में नहाने लगीं, कुछ देर बाद 'बदसूरती' पानी से निकली और तट पर आकर खूबसूरती के  कपड़े पहन कर चलती बनी। कुछ देर बाद 'खूबसूरती' भी तट पर आई, उसे अपने कपड़े नहीं मिले तो  उसे अपनी नग्‍नता पर लज्‍जा आ गई, उसने 'बदसूरती' के ही कपड़े पहने और अपने रास्‍ते चली गई।

आज तक आदमी और औरतें दोनों को पहचानने में भूल कर जाते हैं। फिर भी कुछ लोग हैं जिन्होंने  'खूबसूरती' के चेहरे को देखा है और वे उसे उसके बदसूरत वस्‍त्रों के बावजूद पहचान जाते हैं, कुछ लोग हैं जो बदसूरती के चेहरे को पहचानते हैं और उसके चकमक कपड़े उनकी आंखों को धोखा नहीं दे सकते।

ज़िब्रान साहब की ये कहानी सिर्फ कहानीभर नहीं है, यह पूरे के पूरे मानव दर्शन, उसकी इच्‍छाएं व भ्रम  को दिखाती है।यह दिखाती है कि जितना अंतर नग्‍नता और अश्‍लीलता में होता है, उतना ही अंतर नग्‍नता और खूबसूरती में भी होता है।

बॉलीवुड में आजकल एक चलन है कि अभिनेत्रियां अपनी गर्भावस्‍था यानि बेबी बंप के प्रत्‍येक चरण का  सरेआम प्रदर्शन करती हैं, इनके दीवाने सोशल साइट पर इनके पिक्‍चर्स आते ही टूटकर इनके कसीदे  पढ़ने लगते हैं। अब दीवाने हैं तो कसीदे पढ़ेंगे ही, मगर बेबी बंप के साथ इनकी तस्‍वीरें ज़िब्रान साहब  की 'बदसूरती' द्वारा खूबसूरती के कपड़े पहनने वाली फितरत को सही ठहराती हैं।
गर्भावस्‍था की तस्‍वीरें, स्‍तनपान कराती तस्‍वीरें, होड़ के स्‍तर तक बेबी-शॉवर (गोदभराई) के दौरान अपने  प्रेग्‍नेंसी गाउन को खींचकर स्‍पेशली बेबी बंप दिखाने का शौक पागलपन की हद तक देखा जा रहा है।

सी-बीच पर बिकनी फोटो, अभिनेत्री-अभिनेता के किस करते फोटो के बाद अभिनेत्री-अभिनेत्री के बीच  लेस्‍बी-किस के फोटो से ऊबीं ये अभिनेत्रियां वायरल होने की चाह में ''छा जाने'' की हवस के कारण  गर्भावस्‍था जैसे नितांत व्‍यक्‍तिगत और गरिमामयी अनुभव को इस फूहड़ता से प्रदर्शित कर रही हैं कि  गर्भावस्‍था अश्‍लील नज़र आने लगी है।

फिल्‍मों में नकार दी गई हों या बड़े घराने से ताल्‍लुक रखती हों, ''इमेज-कैश'' करने को इनके द्वारा  कराया गर्भावस्‍था का फोटोसेशन इनके लिए एक ''शगल'' भर है जो बाजार और मीडिया को अपनी ओर  आकर्षित करने का हुनर बखूबी जानता है।

अभिनेत्रियों के ''गर्भ'' के हर माह का क्रमवार प्रदर्शन करने वाली ये तस्‍वीरें सिर्फ गर्भावस्‍था का ही  मजाक नहीं उड़ातीं, बल्‍कि उनकी ये तस्‍वीरें उन महिलाओं का मजाक उड़ाती नजर आती हैं जो अपने  गर्भ का प्रदर्शन करना तो दूर उसको सहेजती हैं... संभालती हैं... संवारती हैं... ताकि आने वाला मेहमान  पूरी गरिमा के साथ संसार में जन्‍म ले सके। यह तस्‍वीरें उन महिलाओं का भी मजाक उड़ती नज़र  आती हैं जो इस दौरान भी अपने परिवार का पोषण करने को रातदिन लगी रहती हैं। अकसर दिख  जाऐंगीं ऐसी तस्‍वीरें जहां महिला कामगार अपने गर्भ के साथ ईंटों को अपने सिर पर रखे होगी।  बॉलीवुड की ये 'मॉम' उन महिलाअधिकारवादियों की सोच पर प्रश्‍नचिन्‍ह भी लगाती हैं जो ''बोल्‍डनेस''  के नाम पर बेची जा रही इस ''फूहड़ता'' को नजरंदाज़ किए हुए हैं। वस्‍त्रहीन होना खूबसूरती का पैमाना  नहीं हो सकता। यदि ऐसा होता तो आज भी महिलाएं-नवयौवनाएं ''मधुबाला'' होने की चाहत नहीं रखतीं,  आज भी कपड़ों में लकदक ढंकी मीनाकुमारी और नरगिस की ऊंचाई कोई अभिनेत्री क्‍यों नहीं पा सकी, यह सोचना होगा।

बहरहाल, अभिनेत्रियों से तो ''समाज के लिए'' कुछ भी सोचने या करने की आशा करना भी बेमानी है  मगर फेमिनिस्‍ट्स, मीडिया के साथ साथ अभिनेत्रियों की इस फूहड़ता को लेकर यदि हम भी नग्‍नता  और खूबसूरती में अंतर नहीं कर पा रहे हैं और आधुनिकता या 'बोल्‍डनेस' के शब्‍दजाल में अपनी सोच  को 'रैपअप' कर स्‍वयं को स्‍वतंत्र बता रहे हैं तो यह समाज की सोच को ही अश्‍लीलता की ओर ले  जाना होगा। इन अभिनेत्रियों की तस्‍वीरों को वायरल करके ज़रा सोचिए कि हम अपनी पीढ़ियों को  एक्‍सपोज और एक्‍सपोजर के नाम पर वल्‍गैरिटी का ये कौन सा पाठ पढ़ा रहे हैं।

और अंत में-
माफ करना खलील ज़िब्रान, आपकी ''खूबसूरती'' को विचारों की नग्‍नता का जामा पहनाकर इसे सोशल मीडिया पर बेचा भी जा रहा है और ''बदसूरती'' को बेबी-बंप के नाम पर भुनाया जा रहा है।सेलिब्रिटीज द्वारा दिखाया जा रहा बेबी बंप दरअसल स्‍वतंत्रता के नाम पर अपनी गुमनामी से डरे हुओं द्वारा खुद को लाइमलाइट में लाने का एक ढकोसलाभर है और कुछ नहीं।

-अलकनंदा सिंह

रविवार, 13 अगस्त 2017

सावधान! कन्‍हैया निशाने पर हैं...


जन्‍माष्‍टमी को दो दिन बचे हैं और मथुरा के मंदिरों-घाटों-आश्रमों-गेस्‍ट हाउसों में भारी  भीड़ है। इस भीड़ में अधिकांशत: पूर्वी प्रदेश के दर्शनार्थी ही हैं, इसके बाद क्रमश: अगले  नंबरों पर पंजाब, दिल्‍ली, हरियाणा और राजस्थान व पश्‍चिम बंगाल के लोग आते हैं। हर  बार की तरह इस बार भी शहर के वाशिदों को आशंका है कि जन्‍माष्‍टमी के ठीक बाद इन  दर्शनार्थियों द्वारा छोड़े गए अपने खाने-पीने-रहने-निवृत होने के अवशेषों से महामारी फैल  जाएगी। ब्रज पिछले कई वर्षों से इस आशंका को वास्‍तविक रूप में भुगत भी रहा है।

सरकारी अमला और धार्मिक व समाजसेवी संस्‍थाऐं सब मिलकर दर्शनार्थियों की हर संभव  सेवा और सुरक्षा करता है मगर सड़कों के किनारे बसें रोककर झुंड के झुंड जब निवृत होते  हैं और स्‍नान कार्य संपन्‍न करते हैं तो शहर वासी चाहकर भी उनके प्रति सेवाभाव नहीं  रख पाता और अपने ही अतिथियों के प्रति एक आशंका से भर उठता है।

पिछले लगभग 20 साल के आंकड़े बताते हैं कि गुरूपूर्णिमा और जन्‍माष्‍टमी के ठीक बाद  से पुरे ब्रज क्षेत्र में वायरल, चिकनगुनिया जैसे रोग महामारी की तरह फैलते हैं। पिछले दो  दिन से जापानी इंसेफेलाइटिस के कारण गोरखपुर मेडीकल कॉलेज में जब से बच्‍चों की  मौत का मंज़र देखा है, तब से ब्रज क्षेत्र में ऐसी ही किसी बीमारी की आहट से लोग  चिंतित हैं।

बाबा जयगुरुदेव के अधिकांश अनुयायी पुर्वी उत्‍तरप्रदेश से ताल्‍लुक रखते हैं और शहरी  क्षेत्र में आने वाले हाईवे का आधे से अधिक हिस्‍से पर इनका कब्‍ज़ा रहता है। अतिथियों  की सेवा धर्म होती है मगर अतिथि इस सेवा का जो ''प्रसाद'' ब्रजवासियों को सौंप कर  जाते हैं, वह इस बार भयभीत कर रहा है क्‍योंकि गोरखपुर में हुई मौतों का ताजा उदाहरण  सामने है।  

अधिकांशत: बच्‍चों को ही डसने वाली जापानी इंसेफेलाइटिस नामक इस महामारी से अकेले  पूर्वी उत्‍तरप्रदेश में ही 1978 से अब तक मरने वाले बच्‍चों की संख्‍या लगभग ''एक  लाख'' होने जा रही है। इसमें वो बच्‍चे शामिल नहीं हैं जो नेपाल के तराई इलाकों और  बिहार के सीमावर्ती  क्षेत्रों से गोरखपुर मेडीकल कॉलेज में दाखिल किए गए।

अब तक ''गोरखपुर ट्रैजडी'' को ना जाने कितने कोणों से देखा जांचा जा रहा है, एक ओर  सरकार पर विपक्ष हमलावर हो रहा है तो दूसरी ओर मीडिया ट्रायल करने में कोई कसर  नहीं छोड़ी जा रही है। कहीं कुछ कथित समाजसेवी अपनी पूर्व में व्‍यक्‍त की गई  आशंकाओं को ''सच'' साबित करने पर तुले हैं।

नि:संदेह प्रदेश की योगी सरकार से मेडीकल कॉलेज प्रशासन पर निगरानी रखने में भारी  चूक हुई और इतने बच्‍चों की मौत का कलंक उसे ढोना ही होगा क्‍योंकि लापरवाही के  उत्‍तरदायित्‍व में वह तथा स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय सहभागी रहा परंतु दूसरों पर दोष लादने की  राजनैतिक पृवृत्‍ति को छोड़ अब मरीजों को, मृत बच्‍चों के परिजनों को हालिया राहत देते  हुए खुले में शौच से संपूर्ण प्रदेश (खासकर पूर्वी उत्‍तर प्रदेश) को मुक्‍त करने के अभियान  को कागजों से नीचे उतारने का काम कमर कस कर किया जाना चाहिए।
प्रशासनिक अधिकारियों पर ही नहीं, ग्रामीण स्‍तर पर इसके लिए ''जागरूकता अभियान  इकाईयां'' बनाकर स्‍वयं सरकार के ''राजनैतिक समाजसेवी'' इस अभियान में जुटेंगे तो  स्‍थिति काबू में लाई जा सकती हैं। ये इतना असाध्‍य भी नहीं है।

डिजिटलाइजेशन के इस युग में इस तरह की मौतों के लिए हम जैसे पढ़े-लिखे लोग भी  कम जिम्‍मेदार नहीं हैं यानि वो वर्ग जो अपने सुख तक सिमटा है और दोषारोपण करती  बहसों का आनंद ले रहा है, बजाय इसके कि स्‍वच्‍छता और अशौच के प्रति लोगों को  जागरूक करे।

बहरहाल, मैं वापस मथुरा और ब्रज के अन्‍य धार्मिक स्‍थानों पर फैले उस भय से सभी को  परिचित कराना चाहती हूं जो कि अतिथियों का स्‍वागत करने से पहले उसके आफ्टर  इफेक्‍ट्स से डर रहा है। हमारे कन्‍हाई भी अबकी बार इंसेफेलाइटिस के निशाने पर  हैं...नंदोत्‍सव और राधाष्‍टमी तक वे खतरे में रहेंगे...हमें तैयार रहना ही होगा।

जन्‍माष्‍टमी पर हमारे यहां तो कन्‍हाई जन्‍मेंगे ही, लेकिन हम सभी ब्रजवासी गोरखपुर के  उन कन्‍हाइयों की अकाल मौत से भी बेहद दुखी हैं जो सरकारी खामियों, अपनों के अशौच  और उनकी लापरवाहियों का शिकार बन रहे हैं।

सरकार पर दोषारोपण इलाज मुहैया न कराने के लिए किया जा सकता मगर सफाई की  सोच जब तक हमारे भीतर नहीं बैठेगी, तब तक हम अपने बच्‍चों को यूं ही गंवाते रहेंगे।  हमें गरीब के नाम पर रहम परोसने की राजनीति छोड़नी होगी क्‍योंकि कोई कितना भी  गरीब क्‍यों ना हो, गंदे हाथ धोने को मिट्टी और राख तो सभी जगह मिल सकती है, नीम-  तुलसी हर घर में हो सकता है इसलिए बहानेबाजी, दोषारोपण तथा मौतों के आंकड़े गिनने  से बेहतर है कि सच्‍चाई को स्‍वीकार किया जाए और अपने स्‍वच्‍छता की जिम्‍मेदारी खुद  उठाई जाए।

हम तैयार हैं अपने अतिथियों की तमाम निवृत पश्‍चात फैली गंदगियों को साफ करने के  लिए और अपने कन्‍हाई पर आ रहे महामारियों के खतरे से जूझने के लिए मगर  अतिथियों से भी आशा करते हैं कि वे ब्रज रज के सम्‍मान को तार-तार न करें।
अपनी श्रद्धा के नाम पर ब्रजवासियों को सौगात में ऐसा कुछ परोसकर न जाएं जो उन पर  और उनके परिवार पर भारी पड़े।  

-अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

अंसारी साहब…शहर के कुछ बुत ख़फ़ा हैं इसलिये, चाहते हैं हम उन्हें सज़दा करें

बुद्धिमत्‍ता जब अपने ही व्‍यूह में फंस जाए और पाखंड से ओवरलैप कर दी जाए तो वही स्‍थिति हो जाती है जो आज निवर्तमान उपराष्‍ट्रपति मोहम्‍मद हामिद अंसारी की हो रही है।

''देश के मुस्लिम समुदाय में घबराहट व असुरक्षा का माहौल है'' कहकर आज से निवर्तमान उपराष्‍ट्रपति का टैग लगाकर चलने वाले हामिद अंसारी ने अपने पूरे 10 साल के राज्‍यसभा संचालन पर पानी फेर लिया। 24 घंटों में ऐसा क्‍या हुआ जो हामिद अंसारी को असुरक्षित कर गया, रिटायरमेंट फोबिया की गिरफ्त में आ चुके 80 साल की उम्र पार कर चुके अंसारी ने देश के उस माहौल पर उंगली उठाई है जो इक्‍का-दुक्‍का दुर्भाग्‍यपूर्ण घटनाओं से प्रेरित है। ज़ाहिर है वे अपनी सियासती वफादारी साबित करने पर आमादा दिखाई दे रहे हैं।

बतौर काबिलियत 01 अप्रैल 1934 को जन्‍मे मोहम्मद हामिद अंसारी ने अपने करियर की शुरुआत भारतीय विदेश सेवा से एक नौकरशाह के रूप में 1961 के दौरान तब की थी जब उन्हें संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का स्थायी प्रतिनिधि नियुक्त किया गया। वे आस्ट्रेलिया में भारत के उच्चायुक्त भी रहे। बाद में उन्होंने अफगानिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात, तथा ईरान में भारत के राजदूत के तौर पर काम किया, वो भारतीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष भी रहे। 1984 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। वे मई सन 2000 से मार्च 2004 तक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उपकुलपति रहे। 10 अगस्त 2007 को भारत के 13वें उपराष्ट्रपति चुने गये थे। 2002 के गुजरात दंगा पीड़ितों को मुआवजा दिलाने और सदभावना के लिए उनकी भूमिका के लिए भी उन्‍हें सराहा जाता है।


हामिद अंसारी ने बतौर उपराष्‍ट्रपति राष्ट्रीय ध्वज़ को सेल्यूट नहीं किया
कल जब उनका विदाई समारोह हो रहा था, तब प्रधानमंत्री मोदी आदतन उनसे चुटकियां ले रहे थे, ऐसे में मुझे एक सीन याद आ रहा था, अमेरिकी राष्‍ट्रपति ओबामा के आगमन पर इन्‍हीं हामिद अंसारी ने बतौर उपराष्‍ट्रपति राष्ट्रीय ध्वज़ को सेल्यूट नहीं किया। एक नहीं, ऐसे अनेक वाकये हैं जिनका कम से कम अब उनके इस ''मुस्‍लिमों के लिए असुरक्षा वाले'' बयान के बाद जवाब लिया जाना चाहिए।

10 साल तक देश का उपराष्ट्रपति रहते हुए क्‍या अंसारी साहब ये बतायेंगे कि भारत अगर मुस्‍लिमों के लिए असुरक्षित है तो-


कांग्रेस सरकार ने पूरी दुनिया से दुत्कारे हुए 50000 रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में क्यों बसाया,
कश्‍मीर राज्‍य से सभी पंडितों को किसने भगाया,
हमारे राष्‍ट्रपति कलाम साहब क्‍या मुस्‍लिम नहीं थे, क्‍या वो असुरक्षित थे इसीलिए इतने बड़े वैज्ञानिक बन गए,
भारत मुस्‍लिमों के लिए असुरक्षित है तभी तो 6 करोड़ बंग्लादेशी पिछ्ले 45 साल से यहाँ देश के संसाधनों को लूट रहे हैं, पश्चिम बंगाल, असम की जनसांख्‍यिकी तो ध्‍वस्‍त ही इन्‍होंने की,
भारत असुरक्षित है इसलिए छोटा ओवैसी यह कह पाता है की देश से 15 मिनट पुलिस हटा दो हम सब हिन्दुओं का सफाया कर देंगे,
भारत मुस्‍लिमों के लिए असुरक्षित है तभी तो जेएनयू में भारत के टुकड़े करने वाले पूरे देश के टैक्‍स पर पल रहे हैं,
भारत असुरक्षित है इसलिए लव जिहाद और धर्म परिवर्तन यहाँ सामान्य घटनाएं हैं,
भारत मुस्‍लिमों के लिए असुरक्षित है इसीलिए पाकिस्तान के झंडे और पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे कहीं भी लगाये जा सकते हैं,
मुस्‍लिमों के लिए असुरक्षा का माहौल है तभी तो दिल्‍ली के जाफराबाद, सीलमपुर और अन्य मुस्लिम इलाकों में किसी हिन्दू की जमीन खरीदने की हिम्मत नहीं होती, इन इलाकों में अघोषित धारा 370/35 लगी हुई है,

भारत मुस्‍लिमों के लिए असुरक्षित है इसीलिए 26 अगस्‍त 2015 को जारी जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 10 सालों में मुस्लिमों की जनसंख्या में भारी इजाफा दर्ज किया गया, यानि उनकी आबादी में 24.6 फीसदी की बढ़ोत्तरी।
अजीब आंकलन है अंसारी साहब का- असुरक्षा में तो लोगों की चिंताएं बढ़ती हैं तो क्‍या चिंतित व्‍यक्‍ति बच्‍चे पैदा करने में जुट जाते हैं,

तो अंसारी साहब...

दुनिया में "मुसलमानों" को कोई भी देश अपने यहाँ नहीं आने देना चाह्ता ...
यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका में रहने वाले पाकिस्तानी, बांग्लादेश अफगानिस्तान के मुस्लिम्स खुद को वहां इंडियन बताते हैं क्यूंकि बाकी मुस्लिम्स को तो वहां आंतकवादी माना जाता है।

ये भारत है जहाँ ग्रेजुएट होने वाली मुस्‍लिम बेटियों को केंद्र सरकार 51000 रुपये बतौर शगुन देने की घोषणा करती है ताकि बच्‍चियां पढ़ सकें और देश-दुनिया का मुकाबला अपने बूते कर सकें। उन्‍हें किसी हामिद अंसारी की सलाह की जरूरत ही ना पड़े।

आप जैसे लोगों ने मुसलमानों को सभी के साथ मुसलमान की बजाय ''मुसलमान बनाम अन्‍य'' बना दिया है। तभी तो विश्‍वभर के गैर इस्लामिक लोगों में मुस्लिम के प्रति नफरत बढ़ी है लेकिन हम खुश हैं क्‍योंकि हमारे देश में अधिकांश गैर मुस्लिम अब्दुल कलाम जी को ही अपना आदर्श भी मानते हैं ।

और 24 घंटे के अंदर दो बार दिए गए इस एक बयान के बाद निश्‍चित ही आप आदर्श बनने से चूक गए हैं।
गनीमत रही कि आपकी डिप्‍लोमैटिक-सियासती सोच से आपकी पत्‍नी सलमा अंसारी अलग सोचती हैं। जब ट्रिपल तलाक पर बहस-मुबाहिसे चल रहे थे तब आपने खामोशी क्‍यों ओढ़े रखी, मगर सलमा जी ने देवबंदियों के खिलाफ जाकर कहा मुस्लिम महिलाओं को खुद क़ुरान पढ़ने और किसी के कहने पर गुमराह नहीं होने की सलाह दी थी।

मोहम्मद हामिद अंसारी ने जाते-जाते अपने व्‍यक्‍तित्व की जो आखिरी छाप देशवासियों पर छोड़ी है, वह उन्‍हें एक पाखंडी दर्शाती है। और कोई भी समाज या सरकार किसी पाखंडी को तब तक दण्डित नहीं कर सकती जब तक पाखंडी अनैतिकता का प्रदर्शन करते पकड़ा न जाए।

एक शिक्षाविद् होने के नाते अंसारी साहब ये बखूबी जानते होंगे कि पाखंडी अनैतिक आचरण वाले व्यक्ति के समान खुले तौर पर अपराध नहीं करता। वह योजनाबद्ध तरीके से इस प्रकार अपराध करता है कि उसका ऐसा आचरण आसानी से न पकड़ा जा सके। ऐसा व्यक्ति प्रायः ऐसे व्यक्तियों को अपना शिकार बनाता है जो उसके बाह्य आचरण के मोह जाल में फंसे होते हैं, ऐसे लोगों को पकड़ने के लिए जाल बिछाने की आवश्यकता होती है और यहां तो अंसारी साहब स्‍वयं को ''मुस्‍लिम हितरक्षक'' बताने के अपने पाखंड को खुद ही सरेआम कर चुके हैं।
बहरहाल, देश का मुसलमान तुष्‍टीकरण की राजनीति के दुष्‍चक्र से काफी कुछ बाहर आ चुका है, जो शेष है वह भी अपना भला-बुरा ''कांग्रेस-बीजेपी-सपा-जदयू-राजद-तृमूकां-माकपा'' आदि के अलावा भी सोच सकता है।

कल मुंबई में 1000 उलेमाओं द्वारा देश के मुसलमानों की सोच को यूएन तक भेजा गया, यह एक बानगी है हामिद अंसारी साहब, कि मुसलमान देश में असुरक्षित नहीं हैं बल्‍कि वह अपने ही ''कट्टरवाद'' से असुरक्षित हैंं, जिसे अगर आप जैसे शिक्षाविद् ''स्‍वस्‍थ-सोच'' के साथ दूर करने में  लगें तो दूर किया जा सकता है, बस 80 बरस बाद भी  सियासत करने से बाज आयें ।

अनवर जलालपुरी ने आज की इस परिस्‍थिति पर क्‍या खूब कहा है-

खुदगर्ज़ दुनिया में आखिर क्या करें
क्या इन्हीं लोगों से समझौता करें

शहर के कुछ बुत ख़फ़ा हैं इसलिये
चाहते हैं हम उन्हें सज़दा करें

चन्द बगुले खा रहे हैं मछलियाँ
झील के बेचारे मालिक क्या करें

तोहमतें आऐंगी नादिरशाह पर
आप दिल्ली रोज़ ही लूटा करें

तजरुबा एटम का हम ने कर लिया
अहलें दुनिया अब हमें देखा करें



-अलकनंदा सिंह

शनिवार, 5 अगस्त 2017

चोटी कटवा: खौफ़ की मौत तो जाहिल मरा करते हैं

सबसे पहले एक शेर-
बड़े खौफ़ में रहते हैं वो, जो ज़हीन होते हैं
मगर खौफ़ की मौत तो जाहिल मरा करते हैं...

और इन्हीं दो पंक्‍तियों के साथ आज सुबह तक चोटी काटने की घटनाओं की संख्‍या बढ़कर 62 पहुंच गई।

ग़ज़ब है इस देश की रंगत कि हर छ: महीने के अंतराल पर कोई न कोई ऐसी अफवाह मुहैया करा देती है जो लोगों के ''ज़ाहिल होने'' का फायदा बखूबी उठाती है।

गाहे ब गाहे फैलने वाली इन अफवाहों के चलन पर गौर करें तो एक बात इनमें कॉमन है कि इनके शिकार और शिकारी दोनों ही उस तबके से आते हैं जहां जागरूकता का नामोनिशान नहीं होता, ये दायरा गांव-खेड़े से लेकर शहर के उन लोगों तक फैला है जो किसी भी बात को जांच-परखने की बजाय जस का तस मान लेने के आदी होते हैं। इन्‍हीं का फायदा धर्म के छद्म गुरुओं से लेकर तांत्रिकों तक उठाया जाता है, एक कदम और आगे बढ़कर बाजार भी इन्‍हें कैश करने में पीछे नहीं रहता।

डर का बाजार से बहुत बड़ा रिश्‍ता है। लोगों में बीमारियों का डर फैलाकर दवा कंपनियां और चिकित्‍सक हों या गरीब होने का डर फैलाकर चिटफंड कंपनियां, करियर में पीछे रह जाने का डर फैलाकर टैक्‍निकल एजूकेशन संस्‍थान, पति-भाई-पिता की 'उम्र कम' हो जाने का डर फैलाकर कई त्‍यौहारों को अपने तरीके से सैलिब्रेट करन वाने वाली कंपनियां हों, सभी डर फैलाकर अपनी मार्केटिंग का स्कोप बढ़ा रहे हैं। तो फिर चोटी काटने की अफवाह को सच कैसे मान लिया जाए।

यह और कुछ नहीं मास हिस्टीरिया नाम की मानसिक समस्या है। इस समस्या के तहत एक स्‍थान विशेष में रहने वाला पूरा समूह किसी अफवाह पर भरोसा कर लेता है और उसे सच मानने लगता है। और तो और इन्‍हें सच मानकर लोग इस तरह की हरकतें करने भी लगते हैं। इसी तरह एक बार मुंहनोचवा की खबर फैली थी जिसे आजतक किसी ने नहीं देखा लेकिन अफवाह पर लोगों को इतना विश्वास हो गया कि सोते वक्त उन्हें लगने लगा कि कोई उन्हें नोचकर भाग रहा है।

मास हिस्‍टीरिया के ऐसे केस भारत में होते हों , ऐसा नहीं है बल्‍कि यह पूरे विश्‍व में फैले हुए हैं तभी तो ''इकॉनॉमिक वॉरफेयर: सीक्रेट ऑफ वेल्‍थ क्रिएशन इन द एज ऑफ वेलफेयर पॉलिटिक्‍स'' के लेखक जायद के. अब्‍देलनर कहते हैं कि
“Always remember... Rumors are carried
by haters, spread by fools, and
accepted by idiots.”


होम्‍योपैथी में तो बाकायदा किसी भी रोग का इलाज ही मानसिक लक्षणों के आधार पर किया जाता है और मास व इंडीविजुअल हिस्‍टीरिया के लक्षणों में पाया गया है कि रोगी को हमेशा अपने आसपास कोई छाया सी महसूस होती है, कभी कोई दूसरा (invisible) उन्‍हें शरीर के अमुक अंगों पर कोच रहा होता है, कभी रोगी को लगता है कि उसके शरीर में बहुत दर्द व जलन है जबकि पैथॉलॉजिकली लक्षण किसी बीमारी के नहीं मिलते। इन मानसिक अवस्‍थाओं के लक्षणों वाले रोगियों को होम्‍योपैथी में दवाओं से ठीक करने का निश्‍चित प्रावधान है।

अफवाहों के इस बाजार में मीडिया का भी अपना हिस्‍सा है, वह ज़रा सी बात को तूल देने का आदी है, रीडर्स और व्‍यूअर्स की संख्‍या का लालच सारे एथिक्‍स किनारे करवा देता है और जागरूकता फैलाने के लिए जिस माध्‍यम को प्रयुक्‍त किया जाना चाहिए, वह फ्रंट पेज पर चोटी कटने की घटनाओं को लीड बनाकर अपना जहालत और लालच दोनों दिखा देता है। चोटी कटी, अस्‍त-व्‍यस्‍त कपड़ों में बेहोश पड़ी महिलाओं के फोटो आज के हर समाचारपत्र का चेहरा होते हैं। जिन्‍हें जागरूकता फैलाने और अंधविश्‍वास को हटाने का माध्‍यम बनना चाहिए, वे भी अफवाहों से अपना कलेक्‍शन करने की सोच रहे हैं।

बहरहाल अफवाहें हमारी अपनी सोच का आइना होती हैं, हमारी सोच जितनी डरी हुई होगी उतनी ही ''किसी और की बात'' ''किसी और का सच'' '' किसी और का चरित्र'' अपने मनमुताबिक ढाल लेगी। ''किसी और'' के लिए किया गया आंकलन स्‍वयं की सोच पर आधारित होता है।

चोटी कटवा: पुलिस-प्रशासन की एडवाइजरी

पुलिस-प्रशासन चाहे कितनी भी एडवाइजरी जारी कर दे मगर चोटी कटने जैसी इस डरी हुई सोच का इलाज तो प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति को स्‍वयं करना होगा।
समाज में अंधविश्‍वास के प्रति लगातार जागरुकता अभियान चलाए जाने की आवश्‍यकता है। सामाजिक चेतना ही एकमात्र ऐसा माध्‍यम है जो अफवाहों की संक्रामकता को कम कर सकता है।




और अंत में एक अनाम कवि की कविता- इन अफवाहों के नाम

अफवाहें भी उड़ती/उड़ाई जाती हैं,
जैसे जुगनुओं ने मिलकर
जंगल में आग लगाई
तो कोई उठे कोहरे को
उठी आग का धुंआ बता रहा
तरुणा लिए शाखों पर उग रहे
आमों के बोरों के बीच
छुप कर बैठी कोयल
जैसे पुकार कर कह रही हो
बुझा लो उड़ती अफवाहों की आग
मेरी मिठास सी कुह-कुहू पर ना जाओ
ध्यान ना दो उड़ती अफवाहों पर
सच तो यह है कि अफवाहों से
उम्मीदों के दीये नहीं जला करते
बल्कि उम्मीदों पर पानी फिर जाता है
ख्वाब कभी अफवाह नहीं बनते
और यदि ऐसा होता तो अफवाहें
मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे,गिरजाघर से
अपनी जिंदगी की भीख
भला क्यों मांगती ?

- अलकनंदा सिंह
Blog: www.abchhodobhi.blogspot.in

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

एक फॉन्‍ट की ताकत: जिसने एक सत्‍ताधीश को कुर्सी से उतार फेंका


कभी कवि रामधारी सिंह "दिनकर" ने कलम का महत्‍व बताते हुए लिखा था-

दो में से क्या तुम्हें चाहिए कलम या कि तलवार 
मन में ऊँचे भाव कि तन में शक्ति विजय अपार

अंध कक्ष में बैठ रचोगे ऊँचे मीठे गान
या तलवार पकड़ जीतोगे बाहर का मैदान

कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली, 
दिल की नहीं दिमागों में भी आग लगाने वाली 

पैदा करती कलम विचारों के जलते अंगारे, 
और प्रज्वलित प्राण देश क्या कभी मरेगा मारे 

इस कविता को लिखते हुए तब के खालिस देसी समय में दिनकर जी को यह कहां पता था कि अब कलम की जगह वो  फॉन्‍ट ले लेंगे, जो एक तलवार तो क्‍या हजारों हजारों तलवारों को एक साथ काट देंगे। दिनकर जी को तो तब यह भी  कहां पता था कि इन फॉन्‍ट्स की दुनिया अधूरे और बेहाल से एक देश के प्रधानमंत्री को न सिर्फ नाकाबिल करार दे देगी  बल्‍कि उसे सपरिवार जेल की ओर धकेल देगी। जी हां, ये है आज की कलम यानि फॉन्‍ट की ताकत।

अब देखिए ना पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को इसी फॉन्‍ट की ताकत ने आज ज़मीं पर ला पटका, इस फॉन्‍ट  का नाम है ''कैलिबरी''। फॉन्‍ट की इस ताकत को देखकर आज 21वीं सदी के डिजिटल युग में कहा जा सकता है कि  अब तलवार से ज्यादा शक्तिशाली फॉन्ट है।

आज पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने करोड़ों रुपये के बहुचर्चित पनामागेट मामले में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की संपत्ति  की जांच के बाद संयुक्त जांच समिति (JIT) की रिपोर्ट के आधार पर शरीफ और वित्त मंत्री इशाक डार को  अयोग्य करार दे दिया, शरीफ को इसके बाद अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।

हुआ यूं कि पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित JIT को मरियम शरीफ ने जाली दस्तावेजों के जरिए गुमराह  करने की कोशिश की थी। मरियम ने पनामागेट से संबंधित जो दस्तावेज भेजे थे, वो कैलिबरी फॉन्ट में टाइप थे और  दस्‍तावेजों में तारीख 31 जनवरी 2007 के पहले की थी जबकि कैलिबरी फॉन्ट 31 जनवरी 2007 से पहले  व्यावसायिक प्रयोग के लिए उपलब्ध ही नहीं था। तब जेआईटी द्वारा संदेह जताए जाने के बाद सोशल मीडिया में  मरियम नवाज शरीफ की जमकर आलोचना भी हुई। कहा जाने लगा कि बेटी की एक गलती ने बाप को कहीं का नहीं  छोड़ा एक ट्विटर यूजर ने जेआईटी के बयान के स्क्रीन शॉट भी लगाए जिस पर विवाद उठ खड़ा हुआ था, और नतीज़ा  आज दुनिया के सामने है।


क्‍या है कैलिबरी फॉन्ट

कैलिबरी फॉन्ट के चर्चा में आने का रोचक इतिहास है। इसमें रियल इटैलिक्स, स्माल कैप्स और मल्टीपल न्यूमरल सेट  होता है। वार्म एंड सॉफ्ट कैलिबरी को 2004 में लुकास डी ग्रूट ने डिजाइन किया था। एमएस ऑफिस 2007 और विंडोज  विस्टा के लांच के मौके पर कैलिबरी आम लोगों को 31 जनवरी 2007 को उपलब्ध हुआ। एमएस वर्ड में टाइम्स न्यू  रोमन और माइक्रो सॉफ्ट पावर प्वाइंट, एक्सेल, आउट लुक और वर्डपैड में एरियल की जगह डिफॉल्ट के तौर पर कैलिबरी  ने जगह ली। स्क्रीन पर दमदार दिखने वाले कैलिबरी फॉन्ट का एमएस ऑफिस के सभी वर्जन 2016 तक इस्तेमाल  करते रहे।

कुल मिलाकर हुआ ये कि पनामा की लॉ फर्म मोसेक फोंसेका के खुफिया दस्तावेज लीक होने और आज सुबह तक  पनामागेट के आफ्टर इफेक्‍ट में कैलिबरी फॉन्‍ट ने अपना नाम ऐतिहासिक रूप से दर्ज करा लिया। जो कैलिबरी फॉन्‍ट  अभी तक सिर्फ डिजिटल वर्क के लिए प्रयोग किया जाता था, अब उसे एक देश के प्रधानमंत्री को अपदस्‍थ करने के लिए  याद किया जाएगा। इसीलिए आज दिन भर ट्विटर पर चलता रहा In #Pakistan, Calibri is  the font of democracy #NawazSharif.

कवि रामधारी सिंह दिनकर तो कलम की ताकत का महत्‍व तलवार से ज्‍यादा बता गए मगर आज डिजिटल युग में  कलम को फॉन्‍ट ने जिस तरह रिप्‍लेस किया है, वह कम से कम पाकिस्‍तान के लिए तो ऐतिहासिक बन ही गया।
पाकिस्‍तान ही क्‍यों, आज यह पूरे विश्‍व का सच है।

बदलते वक्‍त ने यूं भी आज कलम और हाथ का संबंध लगभग खत्‍म सा कर दिया है। लिखने वाले किसी भी पेशे में  अब कलम की जगह कंम्‍यूटर और उससे उभरे विभिन्‍न फॉन्‍ट का ही इस्‍तेमाल होता है। लिखने-लिखाने की आदत तो  अब सिर्फ उन लोगों तक सीमित रह गई है जिन्‍हें कंम्‍यूटर का प्रयोग करना नहीं आता अन्‍यथा हाथ से लिखना अब  समय की बर्बादी लगती है।

बहरहाल, नवाज शरीफ की बेटी को भी यह इल्‍म नहीं रहा होगा कि एक अदद फॉन्‍ट की किस्‍म उनके पूरे परिवार पर  कितनी भारी पड़ने वाली है। यदि उसे ये इल्‍म रहा होता तो वह किसी कब्र में पैर लटकाकर बैठे मुंशी से ही वो दस्‍तावेज  तैयार कराकर कोर्ट के सामने लाती। हो सकता है कि आज वो मुंशी कोर्ट में गवाही के लिए मौजूद ही नहीं होता, और  होता भी तो उसे खरीदा जा सकता था।

मुंशी की हैंडराइटिंग काफी मुफीद साबित हो सकती थी किंतु अब फॉन्‍ट का क्‍या करें। वह तो ऐसी गवाही भी है और  सुबूत भी जो मियां नवाज को पूरे परिवार सहित ले डूबा। हो सकता है कि इस दौर के कवि या कथाकार अब फॉन्‍ट की  असीमित ताकत को भी अपनी रचनाओं का हिस्‍सा बनाने पर विचार करें।

-सुमित्रा सिंह चतुर्वेदी    



गुरुवार, 20 जुलाई 2017

महिलाओं की FOP Leave: फेमिनिस्‍ट की इतनी हायतौबा क्‍यों ?

डिजिटल प्रगति अब हमारे समय का सच है इसलिए अब इसके बिना सामाजिक या आर्थिक प्रगति के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता।
नित नए प्रयोग हो रहे हैं, नया क्षेत्र होने के कारण इसके साथ आने वाली बाधाओं से निपटा भी जा रहा है, यथासंभव बदलाव भी किए जा रहे हैं।
फिलहाल ये बाधा एक बहस के रूप में हमारे सामने है, जिसे डिजिटल मैग्‍जीन Culture Machine ने शुरू किया है। अभी अभी खबर मिली है  कि मलयाली समाचार पत्र Mathrubhumi News ने भी महिला कर्मचारियों के लिए फर्स्ट डे लीव देने की घोषणा कर दी है ।
जी हां, मैग्‍जीन ने अपनी महिला कर्मचारियों के लिए उनकी माहवारी के पहले दिन पेड लीव #FOPLeave देने का फैसला किया है, मैग्‍जीन ने अपनी First Day of Period Policy (FOP) के तहत इस योजना को लागू करते हुए कहा कि इस एक दिन के ब्रेक से महिला कर्मचारियों की आफिस में कार्यक्षमता पर सकारात्‍मक प्रभाव पड़ेगा।
ज़ाहिर है कि इस एक अनोखे बदलाव को बहस का केंद्रबिंदु होना ही था।
मैं पत्रकार बरखा दत्‍त के कल लिखे गए उस लेख से असहमत हूं कि इस तरह महिलाओं को ‘और कमजोर’ दिखाकर मैग्‍जीन उनके लिए सहानुभूति बटोर रही है। बरखा दत्‍त का कहना है कि आजकल जब महिलाएं अपने दम पर उच्‍चस्‍थान हासिल कर रही हैं, तब मैग्‍जीन का यह कदम बेहद निराशा करता है।
बरखा ने अपना हवाला देते हुए लिखा है कि मैंने करगिल वार की रिपोर्टिंग अपने इसी ”पहले दिन” के चलते पूरी की थी और बखूबी की थी। निश्‍चित ही बरखा का कहना सही है कि काम में पहला दिन बाधा नहीं बनता और ना ही कमजोर बनाता है मगर एक बात तो सर्वथा सिद्ध है कि सभी महिलाओं का शरीर माहवारी के पहले दिन एक जैसा रिस्‍पांड नहीं करता, कुछ को असहनीय कष्‍ट होता है और कुछ को कम।
यहां बात पहले दिन होने वाले कष्‍ट को लेकर किसी तुलनात्‍मक अध्‍ययन की नहीं हो रही, यहां तो Culture Machine नामक मैग्‍जीन ने इस कष्‍ट पर सिर्फ अपना स्‍टैंड रखा है। इस स्‍टैंड के तहत वो महिलाएं जिन्‍हें पहले दिन असहनीय कष्‍ट होता है, वह पेड लीव ले सकती हैं और जिनके लिए उसे झेलना संभव है, वह काम पर आ सकती हैं। यह सुविधा है, न कि कोई शर्त। अब तक जो होता आया है, उसके अनुसार पहले दिन भी काम पर आना उनकी मजबूरी थी जिससे न केवल कार्यक्षमता पर असर पड़ना स्‍वाभाविक है बल्‍कि दर्द सहते हुए दबाववश काम करना अमानवीय भी है। मानवीयता तो यही कहती है कि किसी का कष्‍ट हम कम कर सकें तो जरूर करना चाहिए, और मैग्‍जीन ने वही किया है।
ऑफिस में काम करने वाली हर महिला जानती है कि उसने पहले दिन अगर कष्‍ट के कारण छुट्टी ली तो शारीरिक कष्‍ट के साथ-साथ उसे आर्थिक हानि भी उठानी पड़ेगी।
Culture Machine द्वारा महिलाओं के लिए शुरू की गई इस दोहरे लाभ वाली मानवीय सोच की योजना को कथित आधुनिक महिलाओं अथवा कथित महिला अधिकारवादियों द्वारा महिलाओं की क्षमता पर सवालिया निशान लगाने अथवा इसे उनकी कमजोरी बताने के रूप में ना देखकर बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य की संभावना के रूप में देखना चाहिए।
हार्डकोर फेमिनिस्‍ट्स इस तरह महिलाओं की नैसर्गिक प्रक्रिया को जबरन उनके सम्‍मान से तो जोड़ ही रही हैं, साथ ही उन्‍हें अमानवीय स्‍थितियों में काम करते रहने पर विवश करने की वकालत भी कर रही हैं।
हार्डकोर फेमिनिस्‍ट्स के ऐसे थोथे और निरर्थक विरोध से तो मैग्‍जीन अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर हो सकती है और दूसरे संस्‍थान भी अपने यहां ऐसा कोई प्राविधान लागू करने का विचार त्‍याग सकते हैं क्‍योंकि व्‍यावसायिक मजबूरियों और कार्य की जरूरतों को देखते हुए बहुत सी प्राइवेट कंपनियों तो ऐसा कोई विचार यूं भी नहीं करतीं।
बेशक हमें मालूम है कि रास्‍ते अब भी पुरख़तर हैं, महिलाओं को अपने अपने अधिकारों व कर्तव्‍यों के लिए हर स्‍तर पर लड़ना पड़ रहा है। पारिवारिक व सामाजिक मानदंडों के जितने चक्रव्‍यूहों को आए-दिन महिलाऐं चुनौती दे रही हैं, बाध्‍यताओं को अपने हौसले और ज़िद से हरा रही हैं, मर्यादाओं के नाम पर हो रहे शोषण के सामने खड़ी हो रही हैं, यह उस बदलाव का संकेत है जिसमें हार्डकोर फेमिनिस्‍ट्स के कुतर्क आड़े नहीं आने वाले।
महिलाओं को अच्‍छी तरह मालूम है कि उनके लिए बदलाव का यह जटिल समय है, ऐसा समय जिसमें उन्‍हें संभलना भी है और बहुत-कुछ संभालना भी है।
 
सेल्‍फ प्रूविंग के इस दौर में सभी महिलाओं को पता है कि माहवारी के पहले दिन का कष्‍ट कितने स्‍तर पर झेलना होता है। यदि महिला विवाहित और कामकाजी है तो उसे इस कष्‍ट को कई गुना अधिक झेलना होता है, वह भी सेल्‍फप्रूविंग के साथ।

ऐसे कष्‍ट के बीच मैग्‍जीन का एक दिनी सहयोग भी काफी हो सकता है अत: किसी संस्‍थान के सर्वथा मानवीय स्‍तर पर पहली बार उठाए गए इस कदम की सिर्फ और सिर्फ सराहना की जानी चाहिए, न कि उसे महिलाओं की किसी कमजोरी के रूप में प्रदर्शित करके सस्‍ती लोकप्रियता का हथियार बनाना चाहिए।

रहा सवाल बरखा दत्त के लेख का, तो वह किसी भी ऐसे मुद्दे को भुनाने में कभी पीछे नहीं रहतीं जिससे वह लाइम लाइट में आ सकें और यह भी बता सकें कि उन्‍होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कितने कथित झंडे गाढ़े हैं।
यह बात अलग है कि अपनी उपलब्‍धियों से वह वही जाहिर कराती हैं, जिसके विरोध का आडंबर करती हैं।
मसलन यहां वह ”महिला पत्रकार” होने का पूरा अहसास कराए बिना नहीं चूकतीं।

जैसा कि अपने लेख में भी उन्‍होंने यह लिखकर कराया है कि करगिल वार की रिपोर्टिंग उन्‍होंने अपने उस ”पहले दिन” ही की थी। अब पता नहीं, यह उनका दंभ है अथवा कमजोरी।

-  अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

धर्म की दीमकें

इस विषय पर मैं पहले भी काफी लिखती रही हूं और आज फिर लिख रही हूं क्‍योंकि यह विषय  मुझे हमेशा से न सिर्फ उद्वेलित करता रहा है बल्‍कि नए-नए सवाल भी खड़े करता रहा है।
व्‍यापारिक तौर पर बड़े टर्नओवर के नए वाहक बने सभी धर्मों के अनेक ऐसे धर्मगुरु और धार्मिक संस्‍थान  अपने अपने धर्म के मूलभाव को ही दीमक की तरह चाट जाने पर आमादा हैं जिसमें समाज  कल्‍याण का मूलभाव तिरेहित है इसीलिए सभी ही धर्मों के इस व्‍यापारिक रूप को लेकर सवाल  उठना लाजिमी है। 
चूंकि भारत की लगभग पूरी आबादी लगभग धर्मावलंबी है, हर एक व्‍यक्‍ति किसी ना किसी धर्म  को मानने वाला है और सभी धर्म, पाप से दूर रहने का संदेश देते हैं। हर धर्म में स्‍वर्ग और नरक  की परिभाषाएं भी विस्‍तार से दी गई हैं, इस सब के बावजूद सभी धर्मावलंबियों में इतना अधिक  गुस्‍सा, इतना स्‍वार्थ और इतना अनाचार क्‍यों है?
अपने ''अंडर'' लाखों- करोड़ों अनुयाई होने का दावा करने वाले धर्मगुरू भी इस नाजायज गुस्‍से के  दुष्‍परिणामों से अपने भक्‍तों को अवगत क्‍यों नहीं करा पा रहे।
क्‍यों धर्म ध्‍वजाएं सिर्फ सिर्फ मठ, मंदिर, मस्‍जिद और गिरिजाघरों की प्रतीक बनकर रह गई हैं,  क्‍यों वह मात्र इन धार्मिक स्‍थलों पर फहराने के काम आती हैं। जनकल्‍याण के लिए भी धर्म का  वास्तविक संदेश देने से परहेज क्‍यों किया जा रहा है।  पग-पग पर धार्मिक केंद्रों के होते हुए  दंगे-फसाद-अत्‍याचार-अनाचार-व्‍यभिचार आदि कैसे सर्वव्‍यापी हैं।

प्रश्‍न अनेक हैं परंतु उत्‍तर कमोवेश सभी का एक ही निकलता दिखता है कि धर्म की दुकानें तो  सजी हैं और उन दुकानों से अरबों-खरबों का कारोबार भी हो रहा है, इस कारोबार से बेहिसाब  चल-अचल संपत्‍तियां बनाने वाले भी बेशुमार हैं मगर धर्म ही ''मौजूद'' नहीं है। जाहिर है कि ऐसे  में कौन तो धर्म को समझाएगा और कौन उसका पालन करेगा।

सर्वविदित है कि जब बात ''धर्म'' से जोड़ दी जाती है तो धर्मावलंबियों और उनके अनुयाइयों की  सोच में लग चुकी दीमक को टैबू रखा जाता है और उसी सोच का महिमामंडन पूरी साजिश  के  तहत बदस्‍तूर चलता रहता है। सभी धर्माचार्यों और उनके अंधभक्‍तों की स्‍थिति इस मामले में  समान है। यहां तक कि राजनीतिक दल और सरकारें भी इसी लकीर पर चलती हैं और इनकी  आड़ में धर्म की गद्दियां अपने साम्राज्‍य का विस्‍तार करती जाती हैं।
चूंकि मैं स्‍वयं सनातनी हूं और दूसरे किसी धर्म पर मेरा टीका-टिप्‍पणी करना भी विवाद का विषय  बनाया जा सकता है इसलिए फिलहाल अपने ही धर्म में व्‍याप्‍त विसंगति का जिक्र करती हूं।

पिछले दिनों हमारे ब्रज का प्रसिद्ध मुड़िया पूर्णिमा मेला (गुरू पूर्णिमा मेला) सम्‍पन्‍न हुआ। हमेशा  की तरह लाखों लोगों ने आकर गिरराज महाराज यानि गोवर्धन की परिक्रमा कर ना केवल प्रदेश  सरकार के खजाने को भरा बल्‍कि उन गुरुओं के भी भंडार भरे जिन्‍होंने अपनी चरण-पूजा को  बाकायदा एक व्‍यवसाय का रूप दे रखा है। वैसे गुरू पूजन की परंपरा पुरानी है मगर अब इसकी  रीति बदल दी गई है, इसमें प्रोफेशनलिज्‍म आ गया है। गुरू पूर्णिमा आज के दौर में गुरुओं के  अपने-अपने उस नेटवर्क का परिणाम भी सामने लाता है जिससे शिष्‍यों की संख्‍या व उनकी  हैसियत का पता लगता है।

इन सभी गुरूओं का खास पैटर्न होता है, स्‍वयं तो ये मौन रहते हैं मगर इनके ''खास शिष्‍य'' ''नव  निर्मित चेलों'' से कहते देखे जा सकते हैं कि हमारे फलां-फलां प्रकल्‍प चल रहे हैं जिनमें गौसेवा,  अनाथालय, बच्‍च्‍ियों की शिक्षा, गरीबों के कल्‍याण हेतु काम किए जाते हैं, अत: कृपया हमारी  वेबसाइट पर जाऐं और अपनी ''इच्‍छानुसार'' प्रकल्‍प में सहयोग (अब इसे दान नहीं कहा जाता) दें,  इसके अतिरिक्‍त हमारे यूट्यूब चैनल को सब्‍सक्राइब करें ताकि अमृत-प्रवचनों का लाभ आप ले  सकें।

एक व्‍यवस्‍थित व्‍यापार की तरह गुरु पूर्णिमा के दिन बाकायदा टैंट...भंडारा...आश्रम स्‍टे...गुरू गद्दी  की भव्‍यता...गुरूदीक्षा आयोजन की भारी सजावट वाले पंडाल का पूरा ठेका गुरुओं के वे कथित  शिष्‍य उठाते हैं जो न केवल अपना आर्थिक बेड़ापार करते हैं बल्‍कि बतौर कमीशन गुरुओं के  खजाने में भी करोड़ों जमा करवाते हैं। देशज और विदेशी शिष्‍यों में भेदभाव प्रत्‍यक्ष होता है  क्‍योंकि विदेशी मुद्रा और विदेशों में गुरु के व्‍यापारिक विस्‍तार की अहमियत समझनी होती है।
सूत्र बताते हैं कि नोटबंदी-जीएसटी के भय के बावजूद ब्रज के गुरुओं के ऑनलाइन खाते अरबों  की गुरूदक्षिणा से लबालब हो चुके हैं और इनमें उनके चेलों, ठेकेदारों और कारोबारियों का लाभ  शामिल नहीं है।

भगवान श्रीकृष्‍ण के वर्तमान ब्रज और इसकी छवि को ''चमकाने वाले'' अधिकांश धर्मगुरुओं का तो  सच यही है, इसे ब्रज से बाहर का व्‍यक्‍ति जानकर भी नहीं जान सकता, वह तो ''राधे-राधे'' के  नामजाप में खोया रहता है। 

हमारी यानि ब्रजवासियों की विडंबना तो देखिए कि हम ना इस सच को निगल पा रहे हैं और ना  उगल पा रहे हैं जबकि इन पेशेवर धर्मगुरूओं से छवि तो ब्रज की ही धूमिल होती है।

बहरहाल, खालिस व्‍यापार में लगे इन धर्मगुरुओं का धर्म-कर्म यदि कुछ प्रतिशत भी समाज में  व्‍याप्‍त गुस्‍से, कुरीतियों और बात-बात पर हिंसा करने पर आमादा तत्‍वों को समझाने में, उनकी  सोच को सकारात्‍मक दिशा देने में लग जाए तो बहुत सी जघन्‍य वारदातों और दंगे फसादों को  रोका जा सकता है।

जहां तक बात है जिम्मेदारी की तो बेहतर समाज सबकी साझा जिम्‍मेदारी होती है।
सरकारें लॉ एंड ऑर्डर संभालने के लिए होती हैं मगर समाज में सहिष्‍णुता और जागरूकता के  लिए धर्म का अपना बड़ा महत्‍व है। गुरू पूर्णिमा हो या कोई अन्‍य आयोजन, ये धर्मगुरू  समाजहित में कुछ तो बेहतर योगदान दे ही सकते हैं और इस तरह धर्म की विकृत होती छवि  को बचाकर समाज कल्‍याण का काम कर सकते हैं।

संस्‍कृत के एक श्‍लोक में कहा गया है कि धर्मो रक्षति रक्षितः अर्थात तुम धर्म की रक्षा करो, धर्म  तुम्हारी रक्षा करेगा| इसे इस प्रकार भी परिभाषित किया जा सकता है कि “धर्म की रक्षा करो,  तुम स्वतः रक्षित हो जाओगे| इस एक पंक्ति “धर्मो रक्षति रक्षितः” में कितनी बातें कह दी गईं हैं  इसे कोई स्वस्थ मष्तिष्क वाला व्यक्ति ही समझ सकता है|

अब समय आ गया है कि धर्म गुरुओं को यह बात समझनी होगी। फिर चाहे वह किसी भी धर्म  से ताल्‍लुक क्‍यों न रखते हों, क्‍योंकि निजी स्‍वार्थों की पूर्ति के लिए धर्म को व्‍यावसायिक रुप  प्रदान करने में कोई धर्मगुरू पीछे नहीं रहा है। गुरू पूर्णिमा तो एक बड़े धर्म का छोटा सा  उदाहरणभर है।

- अलकनंदा सिंह