रविवार, 25 जून 2017

इमरजेंसी पर आज बस इतने ही हैं शब्‍द


इमरजेंसी पर आज बस इतना ही कह सकती हूं  कि…इतिहास की एक घटना जिसने भारतवर्ष की  राजनैतिक दिशा-दशा, आरोह-अवरोह, घटना-परिघटना,  विचारधाराओं का विचलन और समन्‍वय के साथ-साथ  हमारी पीढ़ियों को लोकतंत्र की उपयोगिता व संघर्ष को  बखूबी परिभाषित कर दिया….उसे शब्‍दों में समेटा नहीं  जा सकता।
इमरजेंसी के दौरान राजनेताओं और उनके समर्थकों पर  क्‍या गुजरी यह तो नहीं बता सकती मगर चूंकि मेरे  पिता सरकारी डॉक्‍टर थे…सो नसबंदियों की अनेक  ”सच्‍चाइयां” उनके मुंह से गाहेबगाहे सुनीं जरूर हैं और  इस नतीजे पर पहुंची हूं कि किसी भी सर्वाधिकार  सुरक्षित रखने वाले सत्‍ताधीश का ”अहं” जब सीमायें  लांघता है तो वह अपने और अपने परिवार के लिए  इतनी बददुआऐं-आलोचनाएं इकठ्ठी कर लेता है जिसे  सदियों तक एक ”काली सीमारेखा” के रूप में परिभाषित  किया जाता है। ऐसा ही इमरजेंसी की घोषणा करते  वक्‍त पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था और आज  गांधी परिवार के लिए हर वर्ष की 25 जून को सिवाय  भर्त्‍सनाओं के पूरे देश से और कुछ नहीं आता।
बहरहाल आप देखिए ये ”दो उदाहरण”
पहला है वो फोटो जो इंदिरा गांधी के लिए ही नहीं  लोकतंत्र का मजाक उउ़ाने वाले किसी भी नेता के लिए  हमेशा याद किया जाता रहेगा। जी हां, जगमोहन लाल  सिन्हा का फोटो…
justice-jagmohan-sinha
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल  सिन्हा का फोटो जिन्‍होंने 1975 में यू.पी. बनाम राज  नारायण मामले में कहा था ” “याचिका स्वीकृत की  जाती है, जिसका मतलब था “मिसेज़ गाँधी अनसीटेड.”
एक ऐतिहासिक दस्‍तावेज के अनुसार जगमोहन लाल  सिन्हा ने इस तरह की केस की सुनवाई ——
12 जून, 1975 की सुबह इंदिरा गांधी के वरिष्ठ निजी  सचिव एनके सेशन एक सफ़दरजंग रोड पर प्रधानमंत्री  निवास के अपने छोटे से दफ़्तर में टेलिप्रिंटर से आने  वाली हर ख़बर पर नज़र रखे हुए थे. उनको इंतज़ार था  इलाहाबाद से आने वाली एक बड़ी ख़बर का और वो  काफ़ी नर्वस थे.
ठीक 9 बजकर 55 मिनट पर जस्टिस जगमोहन लाल  सिन्हा ने इलाहाबाद हाइकोर्ट के कमरा नंबर 24 में  प्रवेश किया. जैसे ही दुबले पतले 55 वर्षीय, जस्टिस  सिन्हा ने अपना आसन ग्रहण किया, उनके पेशकार ने  घोषणा की, “भाइयो और बहनो, राजनारायण की  याचिका पर जब जज साहब फ़ैसला सुनाएं तो कोई  ताली नहीं बजाएगा.”
जस्टिस सिन्हा के सामने उनका 255 पन्नों का  दस्तावेज़ रखा हुआ था, जिस पर उनका फ़ैसला लिखा  हुआ था.
जस्टिस सिन्हा ने कहा, “मैं इस केस से जुड़े हुए सभी  मुद्दों पर जिस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ, उन्हें पढ़ूंगा.” वो  कुछ पलों के लिए ठिठके और फिर बोले, “याचिका  स्वीकृत की जाती है, “मिसेज़ गाँधी अनसीटेड.”
अदालत में मौजूद भीड़ को सहसा विश्वास नहीं हुआ  कि वो क्या सुन रही है. कुछ सेकंड बाद पूरी अदालत  में तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी. सभी रिपोर्टर्स अपने  संपादकों से संपर्क करने बाहर दौड़े.
वहाँ से 600 किलोमीटर दूर दिल्ली में जब एनके सेशन  ने ये फ़्लैश टेलिप्रिंटर पर पढ़ा तो उनका मुंह पीला पड़  गया.
उसमें लिखा था, “मिसेज़ गाँधी अनसीटेड.” उन्होंने  टेलिप्रिंटर मशीन से पन्ना फाड़ा और उस कमरे की ओर  दौड़े जहाँ इंदिरा गाँधी बैठी हुई थीं.
इंदिरा गाँधी के जीवनीकार प्रणय गुप्ते अपनी किताब  ‘मदर इंडिया’ में लिखते हैं, “सेशन जब वहाँ पहुंचे तो  राजीव गांधी, इंदिरा के कमरे के बाहर खड़े थे. उन्होंने  यूएनआई पर आया वो फ़्लैश राजीव को पकड़ा दिया.  राजीव गांधी पहले शख़्स थे जिन्होंने ये ख़बर सबसे  पहले इंदिरा गाँधी को सुनाई.”
1971 में रायबरेली सीट से चुनाव हारने के बाद  राजनारायण ने उन्हें हाई कोर्ट में चुनौती दी थी.
जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी को दो मुद्दों पर चुनाव में  अनुचित साधन अपनाने का दोषी पाया. पहला तो ये  कि इंदिरा गांधी के सचिवालय में काम करने वाले  यशपाल कपूर को उनका चुनाव एजेंट बनाया गया  जबकि वो अभी भी सरकारी अफ़सर थे.
उन्होंने 7 जनवरी से इंदिरा गांधी के लिए चुनाव प्रचार  करना शुरू कर दिया जबकि 13 जनवरी को उन्होंने  अपने पद से इस्तीफ़ा दिया जिसे अंतत: 25 जनवरी  को स्वीकार किया गया.
जस्टिस सिन्हा ने एक और आरोप में इंदिरा गांधी को  दोषी पाया, वो था अपनी चुनाव सभाओं के मंच बनवाने  में उत्तर प्रदेश के अधिकारियों की मदद लेना. इन  अधिकारियों ने कथित रूप से उन सभाओं के लिए  सरकारी ख़र्चे पर लाउड स्पीकरों और शामियानों की  व्यवस्था कराई.
हांलाकि बाद में लंदन के ‘द टाइम्स’ अख़बार ने टिप्पणी  की, “ये फ़ैसला उसी तरह का था जैसे प्रधानमंत्री को  ट्रैफ़िक नियम के उल्लंघन करने के लिए उनके पद से  बर्ख़ास्त कर दिया जाए.”
और अब दूसरा उदाहरण है अटल जी की कविता-
इमरजेंसी के कालेरूप को अपने शब्‍दों में ढालकर हमारे  सामने लाई गई अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक  कविता पढ़िए जिसे आज प्रधानमंत्री ने अपने ”मन की  बात” कार्यक्रम में शेयर किया है। किसी भी जो  इमरजेंसी की भयावहता को बखूबी दर्शा सकते हैं अटल  जी के ये शब्द …आप भी पढ़िए-
एक बरस बीत गया
 
झुलासाता जेठ मास
शरद चांदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया
 
सीकचों मे सिमटा जग
किंतु विकल प्राण विहग
धरती से अम्बर तक
गूंज मुक्ति गीत गया
एक बरस बीत गया
 
पथ निहारते नयन
गिनते दिन पल छिन
लौट कभी आएगा
मन का जो मीत गया
एक बरस बीत गया।
अब इस दुआ के साथ कि भारत को कभी कोई और  इमरजेंसी न झेलनी पड़े, बेहतर हो कि हम अपने  इतिहास को याद रखें।
  • अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 8 जून 2017

बच्चे हैं तो क्यों शौक से मिट्टी नहीं खाते

मुनव्‍वर राणा साहब लिखते हैं कि -

सो जाते हैं फुटपाथ पे अखबार बिछाकर,
मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाते...


ये अशआर पढ़ते हुए हम भूल जाते हैं कि अब हमें उल्‍टे कदमों पर चलना सिखाया जा रहा है  और ये प्रयास पूरी सफलता के साथ आगे बढ़ रहा है। जी हां, तनाव का एक भरापूरा बाजार  क्रिएट किया जा चुका है, आवश्‍यकताओं की मार्केटिंग में रिसर्च, प्रोडक्‍ट और कंज्‍यूमर तक पहुंचने  की ट्रिक्‍स बताई जाने लगी हैं। हर हाल में इस बात से बचा जा रहा है कि हम अपनी जड़ों की  ओर ना देख सकें क्‍योंकि क्रिएटेड माहौल के साथ हमें अपनी जड़ों से जितना विमुख किया जा  सकेगा, उतना ही मार्केट के ज़रिए हम कैप्‍चर हो सकेंगे यानि उसके Addicted Consumer बन  सकेंगे।

मार्केटिंग के इसी घमासान के बीच 21 जून को योग दिवस मनाया जा रहा है, देश से लेकर  विदेश तक योग की माया और महिमा फैल रही है।

कितना अजीब लगता है कि अब सरकारों को हमें योग सिखाना पड़ रहा है, योग जो घर-घर में  सूर्य प्रणाम और सूर्य को अर्घ्‍य से सूर्यासन तक अपना विस्‍तार पाता था, आज उसी योग के  माध्‍यम से शरीर को स्‍वस्‍थ रखने की अपील सरकारों को करनी पड़ रही है। इस 21 जून के आते  आते तो योग पर रोजाना लेक्‍चर भी होंगे और संकल्‍प भी लिए जाऐंगे मगर 21 जून के बाद  अगले वर्ष की 21 जून तक जिंदगी फिर उसी ढर्रे पर आ जाएगी ज़िंदगी... जड़ों से कटने का  इससे बड़ा और वीभत्‍स उदाहरण दूसरा कोई हो सकता है क्‍या।
यह हमें पुरातन कथाओं में सुनाया जाता रहा है कि जो पौधे हमेशा आसमान की ओर ऊर्ध्‍वगति  से बढ़ते दिखाई देते हैं उनकी जड़ें उन्‍हें उतना ही अधिक मजबूती के साथ पृथ्‍वी से जोड़े रखती हैं  इसीलिए वे अपना वर्तमान और भविष्‍य दोनों ही पृथ्‍वी और आकाश से पोषित करते हैं। तभी  पौधों को वृक्ष बनने के लिए किसी मार्केटिंग की जरूरत नहीं पड़ती।

आज दो शोध रिपोर्ट पढ़ीं, एक में कहा गया है कि ''Dirt is Good'' और दूसरी में बताया गया कि  ''Sleep Therapy'' से वजन कम होता है। दोनों ही रिपोर्ट हमें उन जड़ों की याद दिलाती हैं  जिसमें धूल में खेलना बच्‍चों का शगल माना जाता था और बच्‍चे धूल में खेल कर ही बड़े हो जाते  थे बिना किसी क्रोनिक डिसीज के। विडंबना देखिए कि अब लाखों रुपए शोध पर खर्च कर यह  बताया जा रहा है कि बच्‍चे यदि धूल में खेलेंगे तो उन्‍हें एलर्जी, अस्‍थमा, एक्‍जिमा और डायबिटीज  जैसे रोग नहीं होंगे।

दूसरी शोध रिपोर्ट कहती है कि अच्‍छी नींद से वजन कम होता है, ये बिल्‍कुल नाक को घुमाकर  पकड़ने वाली बात है। अच्‍छी नींद के लिए बहुत आवयश्‍क है शारीरिक मेहनत करना और जब  व्‍यक्‍ति शारीरिक तौर पर मेहनत करेगा तो पूरे शरीर की मांसपेशियां थकेंगीं, निश्‍चित ही  मानसिक तौर पर भी थकान होगी और नींद अच्‍छी आएगी। नींद अच्‍छी आएगी तो मोटापा हावी  नहीं होगा। हास्‍यास्‍पद लगता है कि जब ऐसी रिपोर्ट्स को ''शोधार्थियों की अनुपम खोज'' कहा  जाता है।

इन दोनों ही शोधकार्यों पर मुनव्‍वर राणा के ये अशआर बिल्‍कुल फिट बैठते हैं कि-

''हंसते हुए माँ-बाप की गाली नहीं खाते,
बच्चे हैं तो क्यों शौक से मिट्ठी नहीं खाते।


सो जाते हैं फुटपाथ पे अखबार बिछाकर,
मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाते।।''


बहरहाल, अपनी जड़ों से दूर भागते हम लोग इन शोधकार्यों के बूते अपना जीवन जीने पर  इसलिए विवश हुए हैं कि हमने योग और पारंपरिक जीवनशैली से पूरी तरह दूरी बना ली है। अब  उस तक वापस लौटने के लिए बाजार का सहारा लेना पड़ रहा है, नींद की गोलियां और फैटबर्निंग  टैबलेट्स लेनी पड़ रही हैं। बच्‍चों को अस्‍थमा-डायबिटीज जैसी बीमारियां हमारी ही देन है।
 

इससे भी ज्‍यादा शर्मनाक बात ये है कि योग करने और स्‍वस्‍थ रहने लिए सरकारों को आगे आना  पड़ रहा है। अभी सिर्फ देरी हुई है, दूरी नहीं बनी...इसलिए अब भी समय है कि हम अपनी जड़ों  की ओर... अपनी पारंपरिक जीवन शैली की ओर लौट लें, आधुनिकता से जिऐं मगर इसके दास  ना बनें तभी तो योग शरीर के साथ मन को भी स्‍वस्‍थ रख पाएगा, वरना बाजार तो हमें कैप्‍चर  करने को करोड़ों के वारे-न्‍यारे कर ही रहा है ताकि हम उसके सुरसा जैसे मुंह में समा जाएं।
 

-अलकनंदा सिंह

रविवार, 4 जून 2017

पूर्वाग्रही राजनीति की भेंट चढ़ता संविधान का अनुच्‍छेद 48

पूर्वाग्रह व्‍यक्‍ति के प्रति हों, समाज के प्रति अथवा राजनैतिक पार्टी के प्रति, किसी  भी विषय पर तिल का ताड़ बनाने और उसी आधार पर शंकाओं को वास्तविकता  जैसा दिखाने का माद्दा रखते हैं। रस्‍सी को सांप बनाकर पेश करने की यह ज़िद  किसी के लिए भी अच्‍छी नहीं होती। यही पूर्वाग्रह रीतियों को कुरीतियों में और  सुशासन को कुशासन में बदलते दिखाई देते हैं।
आजकल ”बीफ” के बहाने बड़ी हायतौबा हो रही है। जैसे गौमांस नहीं खाऐंगे तो  मर जाएंगे अथवा अस्‍मिता पर संकट छा जाएगा। पशु बाजार के रेगुलेशन पर जो केंद्र सरकार ने नोटिफिकेशन जारी किया है, उसे कुछ राजनैतिक पूर्वाग्रहियों ने आजकल ”बीफ” खाने की ज़िद बना लिया है।
क्‍या  कहता  है  संविधान
संविधान का अनुच्‍छेद 48 कहता है कि ”राज्‍य, कृषि व पशुपालन दोनों को आधुनिक व वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने को प्रयास करेगा, विशिष्‍ट गायों बछड़ों और अन्‍य दुधारू पशुओं की नस्‍लों में सुधार के साथ-साथ उनके वध पर रोक लगाने के लिए कदम उठाएगा।” केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना महज इसलिए की जाए कि वह गैरकांग्रेसी और अपार बहुमत वाली सरकार है, तो यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं, वह भी तब जबकि संविधान के उक्‍त अनुच्‍छेद को ना तो भाजपा ने बनाया ना तब नरेंद्र मोदी ही राजनीति में आए थे। इसी अनुच्‍छेद में गाय को भारतीय संस्कृति का वाहक माना गया है। तो क्‍या जिन सिरफिरों ने केरल के कन्‍नूर में गाय के बछड़े के साथ जो वीभत्‍सता दिखाई, वह संविधान के इसी अनुच्‍छेद का उल्‍लंघन नहीं माना जाना चाहिए।

फिलहाल के विवाद में पशु बाजार को लेकर सरकार ने जो नए नियम बनाए हैं, उन्हें इस ”बीफ” विवाद ने परोक्ष कर दिया है जबकि नए नियमों में जानवरों की तस्करी और निर्दयता के पहलुओं पर काफी गौर किया गया है।

गौरतलब है कि 23 मई को जब केंद्र सरकार ने पशु बाजार के लिए नए नियमों की  घोषणा की तभी से कुछ तत्‍व केरल व पश्‍चिम बंगाल में बीफ को हाइलाइट करके बवाल काट रहे हैं। हालांकि ये समझ से परे है कि केरल में सिर्फ मांस ”निर्यात” करने वाले बूचड़खानों को लाइसेंस मिला हुआ है तो उन्‍हें दिक्‍कत क्‍यों हो रही है।
यूं भी गतवर्षों से जो घटनाऐं सामने आ रही हैं उनके आधार पर ये कहा जा सकता  है कि केरल को तो किसी को मारने की ”वजह” भी तलाशने की जरूरत नहीं, वहां  तो कुत्ते, गाय, औरत, बच्चे, हाथी और राजनैतिक कार्यकर्ताओं का कत्ल होता  आया है।

पश्चिम बंगाल ने भी मवेशियों की खरीद-फरोख्त को लेकर हो-हल्ला मचाया मगर  उतना नहीं जितना केरल में हुआ, तमिलनाडु में भी नए नोटिफिकेशन को लेकर  थोड़ा बहुत हंगामा हुआ। इसकी बड़ी वजह ये है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु  में ही पशुओं का सबसे ज्यादा अवैध कारोबार होता है। जहां पश्चिम बंगाल से  बांग्लादेश को गर्भवती गायों, बीमार और छोटे जानवरों की अवैध सप्लाई होती है  वहीं तमिलनाडु यही काम केरल के लिए करता है।

नेताओं और छात्र संगठनों ने पशुओं को लेकर जिन नए नियमों पर बयानबाजी की, वह बेहद ही खोखली थी। ये जिस तबके से आते हैं…निश्‍चित जानिए कि इनमें से तमामों ने तो कभी पशु् बाजार की ओर देखा भी नहीं होगा। ये बयानबाजी सिर्फ  सियासी तूफान खड़ा करने के लिए हुई और अब भी हो रही है, इस के चक्कर में  जो नए नियम बनाए हैं उनकी भी हत्या कर दी गई।

अब देखिए कि आखिर पशु बाजारों पर लगाम लगाना क्यों है जरूरी है। पहले हमें  इन बाजारों को नियमित करने की जरूरत को समझना होगा। पशु बाजारों में सिर्फ  दो तरह के जानवर बेचने के लिए लाए जाते हैं। पहले तो वो जो दुधारू होते हैं या  जिन्हें खेती के काम में इस्तेमाल किया जा सकता है, दूसरे वो जो मांस के लिए  बेचे जाते हैं।

यहां यह बात भी जान लेना जरूरी है कि जो उपयोगी जानवर होते हैं उनकी ठीक से  देख-रेख भी की जाती है और उन्हें लाने-ले जाने में भी अपेक्षाकृत कम क्रूरता दिखाई  जाती है, उनकी तस्करी भी कम होती है। इसकी वजह ये है कि उन्हें आसानी से  खरीदार मिल जाते हैं और उनकी सेहत का मालिकों को खयाल रखना पड़ता है, तभी  तो उन जानवरों की अच्छी कीमत मिल सकेगी।

इसके ठीक विपरीत जो जानवर मांस के लिए बेचने लाए जाते हैं, उनकी हालत बेहद  खराब होती है। किसान आम तौर पर वो जानवर मांस के लिए बेचते हैं, जो उनके  लिए बेकार हो चुके होते हैं।

किसान इन जानवरों को दलालों को बेच देते हैं। फिर ये दलाल दर्जन भर या इससे  ज्यादा जानवर खरीदते हैं जिन्‍हें वो बड़े बाजारों में ले जाते हैं, ताकि बड़े दलालों को  बेच सकें। कई बिचौलियों और बाजारों से गुजरते हुए ये जानवर इकट्ठे करके गाड़ियों  में ठूंस करके दूसरे राज्यों में ठेकेदारो को बेचे जाते हैं।
उत्तरी भारत के राज्यों में सबसे ज्यादा जानवर पश्चिम बंगाल भेजे जाते हैं जो  झारखंड, ओडिशा और बिहार से होकर गुजरते हैं। दक्षिण भारत में कर्नाटक,  तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र से जानवरों को केरल भेजा जाता है।

ज्यादातर राज्यों में जानवरों के वध या ट्रांसपोर्ट करने के लिए पशुपालन और  राजस्व विभाग से इजाजत लेनी होती है हालांकि किसी भी राज्य में इन नियमों का  पालन नहीं होता।
पुलिस चौकियों में पैसे देकर यानि ‘हफ्ता’ देकर जानवरों की तस्करी का ये कारोबर  बरसों से चलता आ रहा है। जाने-अनजाने ये सभी लोग जानवरों की तस्करी का  हिस्सा बने हुए हैं और ये बीमारी पूरे देश को लगी हुई है।
कुलमिलाकर ये कहा जाए कि जानवरों की तस्करी का ये बहुत बड़ा रैकेट है, जो हर  राज्य में सक्रिय है तो गलत ना होगा।

देखिए सरकारी रिपोर्ट क्‍या कहती है इस रैकेट के बारे में
गृह मंत्रालय ने 2006 में ही ये पाया था कि जानवरो की तस्करी का आतंकवादी  फंडिंग से सीधा ताल्लुक है। 2008 में असम धमाकों के बाद गिरफ्तार हूजी के  आतंकवादियों ने माना था कि उन्होंने धमाकों के लिए पैसे जानवरों की तस्करी से  जुटाए थे। हर साल सिर्फ उत्तर प्रदेश में जानवरों के तस्करों के हाथों सौ से ज्यादा  पुलिसवाले मारे जाते हैं।
भारत-बांग्लादेश की सीमा पर कई बीएसएफ जवान इन तस्करों के हाथों  कत्ल हो जाते हैं। खाड़ी देशों को मांस के निर्यात में जबरदस्त मुनाफा होता है।  इसीलिए मांस माफिया इसके लिए कुछ भी करने को तैयार होता है।
दिल्ली के गाजीपुर स्थित पशु बाजार में महिलाओं के प्रवेश की अलिखित पाबंदी है।  वो कहते हैं कि मंडी का मंजर बेहद डरावना और विचलित करने वाला होता है।
बिहार के सोनपुर मेले में जहां जानवर कटते हैं, वहां सिर्फ परिचित दलालों को ही  जाने दिया जाता है। स्‍थिति इतनी भयावह है कि अगर कोई वहां कैमरा लेकर जाता  है, तो वो कैमरे के साथ वापस नहीं आ सकता। कई केस में तो उसे स्ट्रेचर पर  लादकर लाना पड़े।
पशु बेदर्दी का अंतहीन सिलसिला
वजह वही है कि कसाईखाने का मंजर बेहद खतरनाक होता है. जानवरों को छोटी  रस्सियों से बांधा जाता है, खरीदार के इंतजार में जानवर कई दिनों या कई बार  हफ्तों तक खड़े रखे जाते हैं। फिर खरीदार उन्हें गाड़ियों में ठूंसकर दूसरे नर्क ले  जाते हैं. बदसलूकी के चलते जानवरों की हालत दयनीय होती है। छोटे जानवर बेचने  के बाद अपनी मां को तलाशते दिखाई देते हैं।

पशु वध में बेदर्दी एक बड़ा मसला है। किसान के घर से कसाई खाने तक के इस  मौत का ये सफर किसी एक खरीदार के मिल जाने से नहीं खत्म होता।

जानवर कई बार बिकते हैं। कई हाथों से गुजरते हैं। हर खरीदार उनसे बदसलूकी  करता है। जानवरों को ठीक से खाना-पानी नहीं मिलता क्योंकि हर खरीदार को पता  होता है कि इसे आखिर में कत्ल ही होना है। कई बार तो जानवरों को फिटकरी  वाला पानी दिया जाता है, जिससे उनके गुर्दे फेल हो जाएं। इससे उनके शरीर में  पानी जमा हो जाता है। इससे जानवर हट्टे-कट्टे दिखते हैं। इससे उनकी अच्छी कीमत  मिलती है। उन्हें पैदल ही एक बाजार से दूसरे बाजार ले जाया जाता है।

दक्षिण भारत के राज्यों में तो जानवरों की आंखों में मिर्च ठूंस दी जाती है ताकि दर्द  से वो खड़े रहें। भले ही खड़े-खड़े थकान से उनकी मौत ही क्यों न हो जाए। मुनाफा  बढ़ाने के लिए ज्यादा से ज्यादा जानवर ट्रक में ठूंसकर ले जाए जाते हैं। वो मंजर  देखकर कई बार बेहोशी आने लगती है।

तस्करी के दौरान कई जानवर दम घुटने से मर जाते हैं। कई की हड्डियां टूट जाती  हैं, आंखें खराब हो जाती हैं, या पूंछ टूट जाती है। किसी के दूसरे अंग बेकार हो  जाते हैं।

चढ़ाने-उतारने के दौरान जानवरों को गाड़ियों में फेंक दिया जाता है, जिससे वो  जख्मी हो जाते हैं। उन्हें खींचकर गाड़ियों में भर दिया जाता है। उन जानवरों पर ये  जुल्म नहीं होता जो दुधारू होते हैं या जिनका खेती में इस्तेमाल हो सकता है।
अत: पशु बाजारों का नियमन और काटने के लिए जानवरों को सीधे किसान से  खरीदने से सबसे ज्यादा नुकसान जानवरों के तस्कर माफिया को होगा। उन ठेकेदारों  और दलालों को होगा जो तस्करी में शामिल हैं।
क्‍या होगा नए नियमों से-
नए नियमों से डेयरी के कारोबार से जुड़े लोगों की जवाबदेही भी तय होगी। उनके  कारोबार से पैदा हुए बाईप्रोडक्ट को लेकर वो जिम्मेदार बनेंगे। भारत सरकार के  इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च ने दूध न देने वाले जानवरों के बेहतर  इस्तेमाल के लिए भी कुछ नुस्खे सुझाए हैं।
राज्य सरकारों को इन नुस्खों को भी लागू करना होगा। डेयरी उद्योग को-ऑपेटिव  के जरिए संगठित तरीके से चलता है। इनके जरिए बेकार जानवरों को काटने के  लिए बेचा जा सकता है। इससे जवाबदेही तय होगी और जानवरों के साथ निर्दयता  भी कम होगी।

मवेशियों को लेकर नए नियमों का विरोध हताशा और कायरता के सिवा कुछ नहीं।
बाकी देशवासियों ने इन नियमों के जारी होने के बाद राहत की सांस ली है। दिवंगत  पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे ने इन नियमों की शक्ल में देश को सबसे बड़ी  विरासत दी है।
और इसी बात पर एक शेर दाग़ देहलवी का-
सब लोग, जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं ।

- अलकनंदा सिंह 

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